प्रकाशक विश्वम्भरनाथ १४२ साउथ मलाका, इलाहाबाद
नंव्रम्बर १६४१
मृल्य डेढ़ रुपया
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विश्वस्भरनाथ
विश्ववाणी प्रेस
साउथ मलाका, इलाहाबाद
अग्र लिखता हैं मेने पंगम्घर से पृछ्धा--/इसलाम क्या है?” उन्होंने जवाब दिया--/जवान को पाक रखना और मेहमाव की खातिर करना |” मेंने परछा--/इईसान क्या है ?” उन्होंने जवाब दिया-- सत्र करना और दूसरों की भलाई करना ।--अहमद
ज़रूरी बात
परिडत सुन्दरलाल जी कई साल से दुनिया के धम, मज़दहव ओर कलचर पर एक बड़ी किताब लिख रहे हैं जो कई वजदों से अभी पूरी नहीं द्वो सक्री। “हज़रत मुदम्मर ओर इसलाम” उसी का एक छोटा सा दिस्सा है। कुछ दोस्तों के कहने पर और इसकी ज़रूरत को ठेखते हुए. इसे अलग छापकर निकाला जा रहा है । इसकी वोली आसान रखी गई है कि सब समझ सके। नागरी ओर उदूं दोनों लिखावटों में यद्ट एक दी बोली में छापी गई है |
यद किताब दोनों लिखावटों में हमारे यहा से मिल सकती है ।
१४२ साउथ मलाका
श्लाहाबाद ४ सतम्बर, १९४१
विश्वस्भरनाथ
हज़रत मुहम्मद ओर
१--अरवों का देश *** दे २---अरबों का रहन सहन हे ३इ--अरनों का धर्म *** शी ४--गेरों की इकूमत ***
५---मुहम्मद साहब का जन्म
६--पहले २५ साल *** *** ७--गहस्थी >मछ 2 बेड प८--अल-अमीन *** *०* १--एकान्त में रहना *** १०--ईश्वर की आवाज़ के ११--मिशन शुरू *** *०-
१२-- भुसीवतों के तेरह साल
१३--मदीने में राजा की हैसियत से *** १४--इसलाम फैलाने का तरीका. *** १५--मदौने पर क्रेश के हमले. **:
१६---इसलाम के कुछ उपदेश देने वाले
इसलास
१७--देश-दग्ना की सज़ा ंस ***. शृशृद्ध
१८---हुदैबियाद की सुलह कक “** १२५, १९--मक्के की दूसरी यात्रा ग *** शैरप्र २०--यहूदियों और मुठलमानों में मेल -** ** १३१ २१--रोम वालो से लड़ाई और जीत *** -*. १३३ २२--मक्के की जीत *** हेड **.. १४१ २३---तई? कृबीले का मुसलमान दोना *** श्र २४--मकक्के की आख़री यात्रा बे ह 05 कप २५--इसलामी हकूसत *** ० «० ***. १६० २६--पैग्रम्बर की शादियां **« “*. १६३ २७--आख़री दिन *** डे “**. श७छर३ २८--पैग्रम्बर का रहन सहन *** **.. श्थ४ २९---इसलाम धरम का निचोड़ कह १५, (कद हु ३०--उपदेश और प्रार्थनाएं (दुआएं) *** ४". २००
३१--थूरोप वालों की कुछ राय हक २१९-२२४
२० कान्यपुसुरादीपमवरेथा/गएंकनपनकरअपपकार॒दरपकमनाधथयासय ही
हु एम... ध्राभादुक
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अरबों का देश
हज़रत मोहस्मद का जन्म अरब देश सें हुआ था। यह देश हिन्दुस्तान से पच्छिम में एशिया के दक्खिन- पच्छिम के कोने मे है। उसके तीन तरफ पानी है। पूरव भे फिरात नदी और उसके बाद ईरान की खाड़ी, दक्खिन मे हिन्द महा- सागर और पच्छिस में लाल समुद्र । उत्तर में छुछ दूर तक रूम सागर है और फिर शाम ( सीरिया ) का देश जो तुर्की से मिला हुआ है। लाल समुद्र अरब की अफरोका के पुराने देशों मिस्र और इथियोपिया से अलग करता है ओर ईरान की खाड़ी अरब को ईरान से अलग करती है। वस्वई ओर कराची के बन्द्रगाहों से अरब एक हज़ार मील से कम है। अरब का मशहूर वन्दर- गाह अदन, जिसे यूरोप से आने वालो के लिये हिन्द महासागर का मोहाना कहा जा सकता है, (१६४० में) अंगरेज़ो के क़ब्ज़े में है। अरब की लम्बाई उत्तर से दक्खिन तक क़रीब १५०० मील ओर चौड़ाई पूरव से पच्छिम तक इसकी लगभग आधो है। फेलाव हिन्दुस्तान के आधे से कुछ ज़्यादह है लेकिन आवादी
मुशकिल से हिन्दुस्तान का पचासवां हिस्सा ।
र् इज्रत मोहम्मद ओर इसलाम
वात यह है कि अरव का वड़ा हिस्सा, खास कर वीच का, णक वहुत वड़ा रेगिस्तान है जिसमें कहीं कहीं सैकड़ों मील तक पानी या हरियाली का निशान तक नहीं मिलता। कहीं कहीं चीच बीच में ओर खास कर किनारों के आस पास ऊंची पहाड़ियाँ ओर हरी भरी घाटियाँ हैं जिनमें किसी किसी जगह त्तरह तरह के नाज और क़हवे के अलावा सेवे और नाशपाती, अंजीर और वादाम, अनार और अंगूर जैसे फल भी चढ़िया ओर वहुत्तायत के साथ होते हैं। लेकिन अरब का खास मेवा खजूर है जिसकी दुनिया में कहीं इतनी क्रिस्में नहीं होतीं जितनी अरब में । वहां के खास जानवर ऊंट, घोड़े ओर गये हैं। अरब के वरावर तेज और उम्दा घोड़े दुनिया में ओर कहीं नहीं होते ओर वहां के गधे भी खूबसूरत, ऊंचे ओर तेज़ चलने चाले दोते हैं।
यूरोप और दूसरे मुल्कों से आने वाले लोग अरव की आवोहवा की खुले दिल से तारीफ करते हैं। यहां तक कि श्प्रेद्नर नामी एक विद्वान, जो यूरोप के सब से ऊंचे पहाड़ अल्पूस का रहने वाला था, लिखता है कि अल्पूस या हिमालय दोनों में से किसी की आवोहवा इतनी ज़्यादह ताक़त और जीवन देने वाली नहीं है जितनी अरब के रेगिस्तान की। ' कहा जाता है कि सिकन्दर ने अरव की आवहवा से खुश होकर हिन्दुस्तान से
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अरबों का देश ३
लोटने पर अरव को जीतने ओर वहीं अपनी राजधानी क्रायम
करने का इरादा किया था लेकिन मौत ने उसे वहां तक पहुँचने नदिया।*
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पप्ररयों का रहन सहन
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मोहम्मद साहब के जीवन और उनके कामों को बयान करने से पहले यह जरूरी है कि हम उनसे ठीक पहले के अरबों की हालत और उनके चलन पर भी एक निगाह डाल लें।
मोहम्मद साहव से पहले इस वात का पता नहीं चलता कि उस सारे देश पर कभी भी किसी एक राजा की हकूमत रही हो |
कई छोटी छोटी बादशाहतें देश के अलग अलग हिस्सों में कमी कभी कायम हुईं और छठी सदी में भी मोजूद थीं। इनमें से कई बादशाहतें कई कई सदी तक रहीं। इनमें कोई कोई बिल्कुल आजाद होती थीं और कोई पास के किसी विदेशी राज के मातहत होती थीं। लेकिन सारा अरव छठी सदी से पहले कभी किसी एक देशी या विदेशी ताक़त के क़ब्ज़े में नहीं रहा। इसी लिये राजकाज के खयाल से उस से पहले अरब को एक राज या एक क़ोम नहीं कहा जा सकता था।
अरब ओर खास कर अरव का वह वीच का हिस्सा जिसे हेजाज कहते हैं, जिसमें मका ओर मदीना के मशहूर शहर हे
अरवयों का रदन सहन ई
ओर जो सदियों से किसी एक राजा या हाकिम के मात्तहत न रहा था, मोहम्मद साहव के वक्त तक सैकड़ों क़चीलों में चंटा हुआ था, जिसमें से एक एक कचीले की कई कई शाझों ओर उनसे कभी कभी सेकड़ो घराने ओर कई कई हज़ार सद, औरत ओर बच्चे मिलकर एक वहुत वड़े कछुनवे की तरह रहते थे। हर कुनवे के सव नर नौरी आपस में प्रेम ओर भाईचारे की डोरी में वंधे रहते थे। सब एक दूसरे का वचाव करना अपना फजे सममते थे । एक दूसरे के लिये बड़ी से चड़ी कुरवानी करने में अपना वड़प्पन सानते थे। क़वीले के अन्दर सव की चीज़ें खुली पड़ी रहती थीं ओर कभी चोरी न होती थी। ऋबीले के लोगों में से किंसी एक की बेइज्ज़ती सारे क़बीले की वेइज्ज़ती समभझी जाती थी, और कचीले की आन का खयाल इन लोगों से इतना बढ़ा हुआ था कि इनकी सब आपस की लड़ाइयों या उनकी छुलह की वही जड़ बुनियाद होती थी ।
हर कवीले का एक सरदार होता था जिसे 'शेख” कहते थे । कबीले के सब कुटुम्बों के सुखियो की राय से शेख का चुनाव होता था । शेख ही अपने क़बीले का हाकिम, फवीले के नौजवानों का जरनैल ओर धर्म के सामलो में सारे क़्बीले का गुरु ओर पुरोहित होता था ।
हर कबीले मे आपस का प्रेस, क़तीले की आन का खयाल, सरदार का कहना मानना, ये सव भलाइयां इन लोगो में मो जूद थीं । बाहर वालों या दूसरे कचीले चालो के साथ में भी अपने दचन
धर इस़तरत मोहम्मद और इसलाम
को पूरा करने, मेहमान की खातिर करने और जिस की वांद पकड़ली उस के साथ टेक निवाहने में अरब हमेशा से मशहूर थे। अलग अलग क़वीलों के लोगों के रहन सहन, उनके रस्म रिवाज, उनकी बोली और उनके मज़हबी खयाल भी काफ़ी मिलते जुलते थे। लेकिन ये सब क॒वीले न किसी एक डोटी में बंधे हुए थे ओर न इन सब का कोई एक राजा था।
इतना ही नहीं, बल्कि सारे हेजाज़ में ओर एक दरजे तक सारे अरब में इन अनगिनत क़वीलों की एक दूसरे के साथ आए दिन लड़ाइयां होती रहती थीं। इन लड़ाइयों का एक सबब यह था कि हर क़बीले को अपनी नसल के वड़प्पन का बेहद् घमण्ड था और अगर किसी क़वीले के एक आदसी ने दूसरे क़बीले के किसी आदसी के सामने अपनी नसल की वड़ाई का वखान कर दिया और दूसरे से न सहा गया तो दोनों तरफ से तलवार खिंच जाती थीं । दूसरा सबब इससे मिलता जुलता यह था कि अगर एक क़बीले के किसी आदसी ने दूसरे क़बीले के किसी आदमी की बेइज्ज़ती कर दी या उसे मार डाला--ओर ये आए दिन की बातें थीं--तो फिर सारे क़वीले की तरफ से चदला और फिर बदले का बदला कई कई पीढ़ियों और कभी कभी कई कई सदियों तक जारी रहता था, जिसमें दोनों तरफ से सैकड़ों जानें जाती थीं।
उस ज़माने के अरव यह सानते थे कि जब कोई आदमी मार डाला जाता है त्तो उसकी आत्मा एक चिड़िया बन कर
अरवों का रदन सदन (>
बरसों उसकी क़त्र के आस पास संडराती रहती है, और “ओरस्कूनी |! ओर्कूनी !” चिल्लाती रहती है, जिसका मत्तलव है--“मुमे पीने को दो ! मुझे पीने को दो ! और जब तक मारने वाले कान उसे पीने को खून मिले और हत्या का बदला न लिया जावे, तव तक वह इसी तरह चिल्लाती रहती है। इसी लिये अपने क़बीले के किसी आदमी या किसी पुरखे की हत्या का बदला लेना हर अरब अपना धर्म सममता था ।
इन घरेलू लड़ाइयो में जो मद औरत या वच्चे क्रेद कर लिये जाते थे वे गुलामों की तरह रखे जाते थे। गुलामों के साथ इन लोगों का सलक वहुत दही घुरा था। जानवरों की तरह वाज्ञारों में वह चेचे जाते थे। किसी शुलाम को मार डालने की कहीं कोई सज़ा न थी। गुलाम ओरतों को अकसर नाचना गाना सिखाया जाता था और फिर उनके साथ वाज़ारी ओरतों जैसा यर्ताव होता था और कभी कभी इनका मालिक उनसे पेशा करा कर पैसा कमाता था।
ऐसी हालत में अलग अलग कबीलो मे प्रम, मेल या एके की आस करना ओर भी कठिन था ।
ओरतो के साथ तब के अरबो का वर्ताव वहुत सराब था। पुराने राजपूतो की तरह उस ज़माने के अरब किसी को ऋपना दामाद मानना, था लड़की का वाप होना अपन लिये बहुत बड़ी शर्म की वात सममने थे। लड़कियों को जिन्दा गाड़ देने का
य हज़रत मोहम्मद और इसलाम
रिचाज आम था | कहीं कहीं तो जब किसी ओरत के वच्चा होने को होता था तो चहीं उसके पास एक गढ़ा खोद दिया जाता था। अगर लड़का पैदा हुआ तो उस गढ़े को योंही पूर दिया जाता था, ओर अगर लड़की हुई तो उसे उसी गढ़े मे डालकर ऊपर से मिट्टी भर दी जाती थी । कहीं कहीं जब॒ लड़की पांच छे वरस की हो जाती थी तो एक दिन उसका बाप उसकी माँ से आकर कहता था,--अपनी बेटी को नए नए कपड़े पहना कर उसे खुशबू लगा दो तो में उसे उसकी माँओं के पास पहुँचा आऊं।” इसके वाद वह लड़की को आबादी से चाहर एक गढ़े तक लेजाता था| लड़की को गढ़े के सिरेपर खड़ा कर नीचे भझांकने को कहता था और फिर अचानक उसे घका देकर गढ़े में ढकेल देता था ओर अपने हाथ से मिट्टी पूर देता था। अरबों में उन दिनों एक कहावत सशहर थी कि--“सबसे अच्छा दामाद क़त्र है |”
मालूम होता है कि इस रिवाज का तीखापन कभी कभी अरबों के दिलों में भी चुभन पैदा कर देता था। कहा जाता है कि एक अरब उसमान नामी की आंखों से ज़िन्दगी भर में सिर: एक वार आंसू टपकते हुए दिखाई दिये, जब कि उसकी उस भोली भाली लड़की ने जिसे वह ज़िन्दा गाड़ने के लिये ले गया था अपने वाप की दाढ़ी पर गढ़े की गद लगी देखकर डसे अपने नन्हे हाथों से पोंछना चाद्दा था।
अरबों का रहन सहन ९
मां वाप की जायदाद में लड़कियों का कोई हिस्सा न रहता था | वल्कि जब कोई आदमी मरता था तो उसकी ओर सच मिलकीयत के साथ साथ उसकी चींबियां भी उसके वारिस की मिलकीयत मानी जाती थीं। इस घुरे रिवाज के सवव सोतेली माँओ के साथ शादी का उन दिनों अरथो में रिवाज मोजूद था | एक आदमी की एक साथ कई कई वीवियां और एक ओरत के एक साथ कई कई मद ये दोनों रिवाज भी थे। आर इनकी तादाद की कोइ रोक थाम न थी । शादी के तरदद तरह के रिवाज थे। व्याह का व॑न्धन धम का वन्धन न माना जाता था | आदमी जब चाहे अपनी औरत को तलाक दे सकता या छोड़ सकता था | इस तरह छोड़ी हुई ओ्रोरत किसी दूसरे के साथ व्याह कर सकती थी। एक ओरत उस्म खरोीज़ा का ज़िक्र इन दिनो मिलता है जिसने एक दूसर॑ के बाद चालीस आदमियो के साथ व्याह किया। आम वदचलनी को ये लोग अपने लिये एक घमण्ड की चीज समभन थे ओर अपनी बंद चलनियो का चेशर्मी के साथ खुले चखान करते थे ।
खजूर के दरझ्तों की अरब से कमी न थी। इस लिये शराब का रिवाज इतना वढ़ा हुआ था कि बहुत शराब पीने से लोगों की अकसर मोतें हो जाती थीं। ज्ञुण० और शराब्र का जोइ है ही। कोई कोई अरब जुए में अपना सच कुछ शारने वाद अपने जिस्म तक की वाज्ञी लगा देते थे ओर अगर हार जाते थे तो हमेशा के लिये जीतने वाले के गुलाम हो जाते थें
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१० दज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
मका ओर उसके आस पास के कुछ क़बीले सैकड़ों वरस से तिजारत करते आते थे ओर इसी से अपना पेट पालते थे। मदीना ओर कुछ दूसरी जगह के लोग थोड़ी वहुत खेती बाड़ी भी करते थे। हेजाज से वाहर के कुछ हिस्सों में भी कहीं कहीं तिजारत या खेती वाड़ी होती थी। लेकिन अरबों का आम धृन्धा सिफ्र ऊंट, वकरियाँ ओर धोड़े वरगगेरह चराना था। दूसरे क़वीले वालों को या रेगिस्तान से जाते हुए तिजारती क़ाफ़लों को लूट लेना ये लोग अपना हक़ सममते थे। दो चार शहरों को छोड़ कर धाको क्रीव क़रीब सारे अरब के लोग उठाऊ चूल्हों की तरह खेमों में रहते थे । मौसम बदलने के साथ साथ या पानी का आराम देख कर ये लोग अपनी जंगह वदलते रहते थे। खेती करके एक जगह जम कर रहने या तिजारत करने को ये बुरा समझते थे।इस तरह के जीवन में किसी तरह की कारीगरी या धन्धे तरघ्रक्री कर ही नहीं सकते । लेकिन इस तरह के जीचन और आए दिन की लड़ाइयो ही के सबव ये लोग आम तौर पर वड़े बहादुर ओर अपने घोड़ों की तरह फुरतीले होते थे ओर इनका रहन सहन बेहद सादा होता था ।
मालूम होता है शुरू से ही इन्हें यह वात भी खटक गई थी कि आए दिन की लड़ाइयों और लूट सार में कुछ दिन ऐस भी होने चाहियें जब वे अपनी घरेलू लड़ाइयोँ को कुछ अरसे के लिये बन्द कर उतने अरसे तक निडर ओर वेफिकर होकर एक दूसरे के साथ मिल बैठ सकें | मोहम्मद साहब के बहुत पहले से
अरवों का रदन सदन श्टै
साल में चार महीने इस वात के लिये छुटे हुए थे कि उन चार महीनों में सब क्वीलों के आपस के झगड़े, हत्या के चले और लूट मार विलकुल वन्द रहा करें। आमतोर पर सब क़तीलों के लोग इस वात को ईमानदारी के साथ मानते ओर निवाहते थे ।
इन चार महीनों के अन्दर ही अरब के सब लोग मछा आकर कावे की यात्रा करते थे, जो मोहस्मद साहव से हज़ारों साल पहले से तमाम अरवों का सव से बड़ा मन्दिर ओर सब से बड़ा तीथ माना जाता था।इन चार महीनों के अन्दर ही उकाज ओर मुजन्ना के दो सशहूर मेले होते थे क्िनमे तमाम क़बीलो के लोग जमा होकर, कहीं अपने अपने लड़ाई के फेंदियो का वदलाव करते थे, कही माल खरीदते बेचते थे, कीं अपने देवताओ की पूजा करते थे ओर कही छोटे मोटे मुशाचरे ( कदि सम्मेलन ) करते थे। लिखने का रिवाज अरखो में मोहम्मद साहब के पहले बहुत कम्म था, फिर भी शायरी करने का उन्हें शुरू से वड़ा चाव था। हर क़बीले में ऐसे शायर या तुरत कवि होते थे जिनकी छोटी छोटो कविताएं या तुक चन्दियां सैकड़ों साल तक एक से दूसरे को जचानी पहुँचती रहती थी। इस तरह के आजाद ओर लड़ाका लोगों के लिये चार नददीने तक अपने दुशसनों, अपने बाप, बेटे था भाई के हत्यारों, की सासने से निकलते देखते रहना ओर अपने गुस्से को कायू मे रखना, जबकि कोई दूसरा उन्हें रोकने दवाने या सजा देने घाना
श्र दज़्रत मोहम्मद ओ्रोर इसलाम
नहीं था, यह बताता है कि अरबों में अपने आपको रोकने और चचन निवाहने की ताकत मोजूद थी। लेकिन साथ ही चार महीने की रोक थाम इस वात को भी जाहिर करती है कि वाक़ी आठ भहदीनों में क्या हालत रहती होगी, ओर इसमें शक नहीं कि इन चार महीनों की रोक थाम के सवंच आठ महीने तक लड़ाइयों ओर वदले की आग ओर भी जोरों के साथ भड़कती डोगी |
अरबों का धमे
धस के सासले में भी उन दिनों अरवों के दिल बहुत छोटे ओर उनके खुयाल बहुत तंग थे। जो धम देश में जारी थे उन्हो ने देश की हालत को और भी विगाड़ रखा था। इनमे तीन खास थे--पुराना अरब धस, यहूदी धर्म और इसाई घम। ईरान और वहां के जरथुरत्री धम के साथ भी अरबो का सद्रियों से लगाव था, उनकी जिन्दगी पर उसका तरह तरह से असर भी था | लेकिन अरबों ने बहुत ज़्यादह तादाद मे कभी उस घम को नहीं माना। कुछ लोग 'सावी' घम के भी मानने चाले थे जो एक परमेश्वर को मानते हुए भी सितारों चगेरह की पूजा करते थे।
थोड़े से कवीलों को छोड़कर जिन्होने यहूदी या रसाड वगै रह धर्म अपना लिये थे वाक़ी सब अरब अपने पुराने धर्म को ही मानते थे | दुनिया के ओर पुराने लोगों की तरदद वे बहुत से देवी देवताओं को सानते और उन्हीं की पूजा करने थे।
हर क़बीले का अपना एक अलग देवता होता था, कोई लकड़ी का, कोई पत्थर का, कोई पीतल का, जोई तांगे का और
श्ड इज़रत मोहम्मद और इसलाम
कोई गुंदे हुए आटे का | किसी देवता की शक्ल आदमी की होती थी, किसी की औरत की, किसी की किसी जानवर की, किसी की पेड़ की, ओर कोई बिलकुल अनगढ़ था। जब दो क्वीलों में लड़ाई होती थी तो वह उनके देवताओं की भी लड़ाई सममी जाती थी और कभी कभी ये लोग आदमियों की तरह दूसरों के देवता को भी कैद करके ले आते थे । देश भर में इन अनगिनत देवी देवताओं की पूजा ठीक उसी तरह होती थी जिस तरह दुनिया की दूसरी पुरानी क्रोमों में ।इन देवताओं के सामने जानवरों की वलि ( क्ुरवानी ) भी दी जाती थी। किसी किसी देवता के सामने आदमी की भी बलि दी जाती थी। ओर कोई कोई तो अपने हाथ से अपने बेटों को काट कर अपने देवताओं के सामने चढ़ा देते थे। बहुत से ऐसे देवता भी थे जिन्हें कई कई क़वीले या करीब करीब सब अरब मानते और पूजते थे। इनसें सबसे मशहूर तीन देवियाँ थीं जिनके नाम लात? 'उज्ज़ाः और मनात” थे। इनके अलग अलग मन्दिर थे। इसी तरह के और भी कई देवी देवताओं के नाम उस जमाने की किताबों में मिलते हैं। कावे के अन्दर भी साल के ३६० दिन के ३६० देवता थे जिनमें सव से वड़ा होवल” नाम का एक देवता था। इन देवताओं के अलावा हज़ारों अरव सूरज, चांद आर कई खास खास तारों की भी पूजा करते थे, जिनसे उन्हें दिनमें गर्मी मिलती थी ओर रात को रास्ते का पता चलता था। ।
अरबों का धर्म श्प्
इन हज़ारो देवी देवताओं के अलावा सब के मालिक एक परमात्मा के सन्दिर का कहीं जिक्र नहीं आता। ज़्यादहतर अरवों का खयाल इन देवी देवताओं से ऊपर न उठ सकता था। लेकिन इस वात का भी पता चलता है कि उनमें कुछ लोग एसे भी थे. जो सच देवताओं से ऊपर सब के मालिक एक परमात्मा को भी मानते थे, जिसे वे “अल्लाह ताला” कहते थे ओर यह मानते थे कि उनके अपने देवी देवता उसी अल्लाह ताला? बे नीचे दुनिया का सारा कास चलाते हैं और परलोक ( दूसरी दुनिया ) में अपने पूजने वालों की अल्लाह ताला से सिफारिश्ष कर सकते हैं ।
कुछ अरवों में एक रिचाज यह भी था कि जब फोई आदमों मरता था तो एक झंटनी उसकी कृत्र के पास चांध दी जादी थी । उस चह्ीं बिना दाना पानी मरने दिया जाता था, जिससे मरने वाले की परलोक में सवारी की दिक्कत न हो । इस ऊंटनी को वे वलियह' कहते थे ।
थोड़े से मे यही अरबो का पुराना धर्म था।
धआवब रहे यहद्वी ओर इसाई घम। ये दोनों भी मोट्स्मद साहव से सदियों पहले अरब पहच चुके थे ।
इसा की पहली सदी मे रोम के सम्राट ( शहनशाह ) टाइटस ने यहूदियों को फिलस्तीन स निकाल दिया था। इसी तरह तीसरी सदी से चहुत से इसाई आपसी भागड़ो की
से शाम ( सीरिया ) और दूसरे मुल्को से निकाले जा ।
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१६ हज़रत मोहम्मद और इसलाम
अरव के लोग इस मामले में बड़े दिल वाले थे। वे अपने यहां सब धम वालों को .ख़ुशी से आने देते थे। हज़ारों यहूदी और ईसाई अरब में आकर बस गए | एशिया के इन दोनों धर्मों का जनम भी अरब की उत्तर की सरहद पर हुआ था। ये दोनों धर्म भी थोड़े बहुत अरब में फैले | कुछ क़वीलों ने इस धम को ओर कुछ ने उस धर्म को अपना लिया ।
मालस होता है दूसरे धर्मों के देवी देवताओं को अपने देवी देवताओं में शामिल कर लेने का भी अरबों में रिवाज था। जिन अरबों ने इन नए धर्मों में से किसी एक को पूरी तरह नहीं अपनाया वे भी इन दोनों के साथ काफ्ती अपनापन जताते थे। बहुत से अरब हज़रत इवराहीम को जिन्हें यहूदी ओर ईसाई दोनों पैग़म्बर मानते थे, अपना ही पुरखा बताते थे ओर इचराहीम के बेटे इसमाईल से अपना निकास बताते थे। कावे में दूसरी मूर्तियों के साथ साथ इचराहीस ओर इसमाइईल के भी छुत मौजूद थे, ओर उनकी भी पूजा होती थी । इसाइयों के पहुंचने के बाद हज़रत इसा की माँ मरियम की एक मूर्ति भी काबे में रख ली गई और उसकी भी पूजा होने लगी। लेकिन यहूदी लोग उन दिनों इतने घमण्डी और तंग खयाल होते थे और ईसाई घसम इतनी गिरी हुईं हालत को पहुंच चुका था और साथ ही इन दोनों धर्मों में आपसी लाग ढाट इतनी बढ़ी हुईं थी कि इनका असर अरवों के जीवन पर अच्छा न पड़ सका।
अरबों का धर्म १७
इन दोनों में से कोई इस चात को मानने के लिये तस्यार न था कि उसके अपने मत या जत्थे से चाहर किसी भी आदमी की, चाहे वह कितना ही नेक क्यो न हो, भरने के वाद अच्छी हालत हो सकती है ।
यहूदी एक ईश्वर और बहुत से पैग़म्बरों के अलावा एज़रा को खुदा का घेटा मानते थे | छुआछूत, खानेपीने के फरक ओर निराले कायदों में अगर दुनिया के किसी मज़हव के रिवाज आजकल के हिन्दू रिवाजों से मिलते हैं तो वह पुराने यल्दी थम के | दूसरे सब धर्मों के लोगो को थे अपने से नीचा और नापाक मानते थे, उनकी छुई हुई कोई चीज़ न खाते थे, न उनका छुआ पानी पीते थे, ओर न उन्हें अपने यहां खिला- पिला या इज्जत से बेठा सकते थे। यही यहदियों की सच से खास वात थी। उनके रस्म रिवाज और पूजा के दर्यज बड़े पेचीदा थे। इन बातों को छोड़ कर अगर उनमें दोई और खास वात थी तो वह साहूकारे और सूदखोरी से पेंसा कमाना, पैसा जमा करना ओर इस त्तरह की कंजूसी बरतना जो बेपैसे चाले पर दिलवाले रंगिस्तानी अरबों को कभी पसन्द्र न ध्या सकती थी ।
ईसाई धर्म यहदी धरम के बाद का था. और उन दिनों के लिए ज़्यादह ठीक था। यह इसाई घर्म इसीलिए दुनिया मे आया था कि यहूदियों मे जो निकस्मे शोर देमाइने रमन्म रिद्ाऊ चल पड़े थे, ओर लकीर की फकीरी बढ़ती जा रही थी. उसे रएृत्म
हु
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श्प्् हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
करके लोगों के दिलों को धर्म की फिज़ूल रस्मों से हटाकर उन्हें एक दूसरे की सेवा ओर भलाई के कामों की तरफ़ लगाया जावे। शुरू में इेसाई धर यहूदी धरम ही की एक शाख सममा जाता था और यहूदी धर्म का सुधार उसकी ग़रज थी। लेकिन मोहम्मद साहब के जन्म तक इंसाई धम की जो गति हो चुकी थी वह यहूदी धरम की उन दिनों की हालत से किसी तरह कम बुरी न थी।
हजरत ईसा के कुछ दिनों बाद से ही इंसाई लोग एक त्तरह की त्रिमूर्ति (7779, तसलीस ) की पूजा करने लगे थे। इस त्रिमूर्ति में आम तौर पर बाप ( ईश्वर ), बेटा ( ईसा ) और पवित्रात्मा (वह मानी हुई रूह जिसके ज़रिये कहा जाता था कि हजरत ईसा की माँ कुमारी मरियम को पेट रहा था ) ये तीन गिने जाते थे | लेकिन कुछ लोग इश्वर, ईसा और मरियम की भी त्रिमूर्ति मानते थे। ईसाई सत की जो शाख ( कॉलीरी- डियन्स ) अरब में ज़्यादह फेली हुईं थी चह ईश्वर, मरियम ओर ईसा की ही त्रिमूर्ति मानती थी ।
ईसाई गिरजे इसा, मरियम, सेकड़ों सन््तों, फ़रिश्तों ओर ईसाई शहीदों के घुतों से मरे रहते थे। मरियम को “ईश्वर की माँ? कह कर उसकी पूजा की जाती थी। ईश्वर, इसा ओर मरियम तीनों एक वरावर माने जाते थे और इनके साथ साथ घहुत से इंसाई सन््तों को भी इन्हीं की तरह सब जगह मौजूद, सव कुछ जानने वाले और जो चाहे कर सकने चाले साना जाता
अरवों का धर्म १०
था। इन सच के घुतों के सामने मन्नतें मानी जाती थी ओर चढ़ावे चढ़ाए जाते थे। यही उस ज़माने के इसाइयों की रोज की पूजा थी ।
वहमों की यह दालत थी कि यरुसलम शहर म॑ लकड़ी का चह ऋश ( सलीव ) अभी तक दिखाया जाता था जिस पर, कहा जाता था कि, महात्मा ईसा को सली दी गई थी । इस छोटे से ऋश की सूखी लकड़ी वरावर घढ़ती रहती थी । हर ईसाई यात्री यरुसलम से लौटते हुए उस क्रश का एक डुकड़ा
कट
अपने साथ ले आता था। आम आदमी उस टुकड़े को अपने घरो में रुख कर उसकी पूजा करते थे और हज़ारों टुकड़े दुनिया भर के गिरजों में रखकर पूजे जाते थे। यरुसलम के पादरियों के लिये यह काफी आमदनी का ज़रिया था। लिसा है. कि धीरे धीरे सिफ यूरोप ही के हज़ारों गिरजो मे इस ऋश से इतनी लकड़ी जमा हो गईं कि उससे सेकड़ो नए ऋदश त्य्यार हो सकते थे। लोगो को यक्लीन था कि इस ऋश की लकड़ी तरह तरह की करामात कर सकती थी ओर सब बीमारियों को अच्छा कर सकती थी। इसी तरह मरियम ओर ह्साई सन््तो की मूर्तियों से भी हर गिरजे में सेकड़ों करामानें होती झाये दिन दिखाई जाती थी ।
टुनिया से इसाई राज की सब से ब्रड़ी ज़गह उन दिन्गे रोम के सम्राट ( शहनशाह् ) की राजवथानी, छुन्तुनतुनिया थी। झुस्तुनतुनिया, सिकन््दरिया और रोम इन तीन शहरों
२०. हज़रत मोहम्मद और इसलाम
के लाट-पादरी ( विशप ) इसाई धर्म के सबसे वड़े महन्त गिने जाते थे। इन लाट-पादरियों की राय से क्रस्तुनतुनिया के सम्राट की तरफ से सारी दुनिया के इसाइयों के नाम यह हुकुम जारी कर दिया गया था कि किसी भी वीमारी में दवाओं से इलाज करना, जैसा पुराने यूनानी करते थे, इश्वर से इनकार करना है और पाप है, ओर इंसाइयों को इलाज के लिये गिरजे के बुतों और पादरियों के पास जाकर दुआएं मांगना चाहिये और इनसे भाड़ फूंक और गण्डे तावीज कराना चाहिये। रोम के इसाईं सम्राटों का जहां जहां हुकुम चलता था वहां चहां दवाओं से किसी का इलाज करने वाले वैद्य हकीम तक को मौत की सज़ा दी जाती थी ।
इसाई पादरियों में इस तरह की वातों पर लम्बी लम्बी चहसें होती थीं, जो कभी कभी पीढ़ियों चलत्ती थीं, कि हजरत इसा में इश्चर का हिस्सा कितना था, जैसे, ईश्वर अजर अमर है यानी न कभी चूढ़ा होता है न मरता है, ऐसे ही हजरत ईसा अजर और अमर हैं या नहीं, मरियम को ऐसा की भाँ? कहना चाहिये या 'इेश्वर की माँ? ओर अगर हजरत आदम शुनाह न करते तो कभी मरते या न मरते ? इन्हीं वातों को लेकर बहुत से अलग अलग दल खड़े हो गए। जब जिस दल का ज़ोर होता थाया कुस्तुनतुनिया के सम्राठ की तरफ से जिसे ठीक मान लिया जाता था, उसके खिलाफ दल वालों को अधर्मी ( हेरेटिक )
अरवों का धर्म २१
कह कर देश निकाला, तरह तरह की तकलीओफें ओर मौत की सजा तक मेलनी पड़ती थी |
सिकन्दरिया के एक चिद्दान पादरी एरियस को सिर इस बात पर देश निकाले की सजा दी गयी कि एरियस कहता था कि,- हजरत इंसा इेश्वर के बेटे हैं, इस लिए एक जमाना ऐसा जरूर था जब ईश्वर था लेकिन हजरत ईसा नहीं थे, इसीलिये हजरत ईसा को ईश्वर के बराबर नहीं माना जा सकता,” इसी गुनाह में पहले एरियस को देश निकाले की ओर फिर आखीर में मोत की सजा मेलनी पड़ी। रोम के सारे राज में यद हुकुम जारी कर दिया गया कि जिस किसी को एरियस की कोई किताव कहीं से मिल जावे, वह अगर उस किताब को तुरत जला न डाले तो उस आदमी ही को मार डाला जावे ।
एक विद्वान ईसाई साधु पिलेगियस ने सिर यह कह दिया था कि--“आदम पैदा हुए थे तो गुनाह करने या न करने मरते जरूर, जन्म से सव आदमी आदम ही की तरह बेगुनाट होते हैं, सब अपने अपने भले घुरे कामो का फल पाते है ध्यदम के कामो का नहीं, और पापों को धोने के लिये नेऊ झामो र्ती जरूरत है, सिफ चपतिस्मे के पानी से पाप नहीं घुन सफल, इतने ही पर पिलेगियस की ओर उन सदर लोगों की जो पिल- गियस की राय को ठीक कहते थे, जायदादे जब्न जरये उन सब को रोम के राज से बाहर निकाल दिया गया।
श्र हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
शाम के एक सशहूर पादरी नेस्तोरियस ने कहा कि सरियम को “खुदा की माँ? कहना ठीक नहीं 'हजरत ईसा की माँ? कहना ' चाहिये | तुरत इसाई महन्तों में दो दल हो गए । पहले चहसें हुईं, फिर वलबे और वाद में खूब खून वहा | आखिर “खुदा की माँ? वाला दल जीता नेस्तोरियस को रोम के सम्राट के हुकुम से पहले देश निकाला देकर अफरीका भेज दिया गया और फिर वहां मौत से पहले उसकी “नापाक जुबान” काट डाली गई।
यूरोप का एक विद्वान लिखता है--
“४ इन भझांगड़ों की वजह से बड़े बड़े नगरों सें खूब हत्याएं होती रहती थीं और खून बहता रहता था। छोटे बड़े सव लोगों में वेइेमानी और वद्चलनी बढ़ी हुईं थी। इससे साफ़ जाहिर था कि राज के साथ मिलकर इंसाई धर्म इतना गिर गया था कि अब वह लोगों के दिलों को रोक कर उन्हें बुराई से न वचा सकता था। धरम का जीवन मिट चुका था, उसकी जगह धर्म के असूलों पर बहसे रह गईं थीं और ये वहसें भी पागलों की चहसे थीं ।*? ह
मोहस्मद साहव के जन्म के दिनों के इंसाई मत और लोगों के जीवन पर उसके असर इन दोनों को बयान करते हुए वही विद्वान आगे लिखता है,--
# ५ है एनाछाठ0ए 0० [/००८७०४॥ 06एण०एपथा 57०००", 97 ]. फ्र. 7729०, ५४०). 3, ९. 289.
अरवों का धर्म श्३
“आदसी की नेकी या वदी का कोई खबाल नहीं किया जाता था। आदमी के पाप उसके घुरे कामों से नहीं नापे जाते थे वल्कि इससे नापे जाते थे कि वह इसाइ धम के साने हुए असूलो से से किससे कितना इनकार करता है। रोम, छुल्तुन- तुनिया ओर सिकन्दरिया के पादरी जी तोड़ कर एक दूसरे से बढ़ने की कोशिशों मे लगे हुए थे ओर इस तरह के हथियारों ओर जूरियो से अपना मतलब पूरा करने थे जो आदमी के दिलको गंदे ओर डरावने मालूम होते हैँ। जबकि पादरी लोग खुद छिपकर हत्याएं कराने, ज़हर देने, वदचलनी करने, आंस्चे निक- लवा लेने, दंगे करा देने, बलबे करा देने ओर आपसी मारकाट में लगे हुए थे, जब कि पादरी और लाट-पादरी ( विशप प्यार आक विशप ) दुनयचो ताऊत के फेर में एक दूसरे छो अधर्मी कह कर सज़ाएं दे रह थे, राज दरवारों फे खबासो को रिशवतें देने में सोना लुटा रहे थे ओर महलों की आओरतों की अपने गन्दे प्रम से जीतने की कोशिशें करत रहते थे, ता 'प्राम लोगों से क्या उम्मीद हो सकती थीं १... इसाई महन्तों की फीजें ऊच कभी सम्राट की फीजों मे जा मिलती थी तो उन्हें घदरा देनी थी ओर अगर बड़े नगरों में जाती थी तो वहां मज्हवी दंगे करा देती थीं, धरम के ऊंचे ऊंचे अतूला को तय करने द न्नयि वे बहुत शोर गुल करती थी, लेकिन सोचने की आछारी छे लिये या आदमी के छीने हुए हफ के लिये कभी फोर 'प्रावाज् न उठती थी । ऐसी सूरत में लोगों के अन्दर सिचाय नफरत प्रौर
२४ हज्नरत मोहम्मद और इसलाम
बेवसी बढ़ने के ओर क्या हो सकता था ? सचमुच लोगों से यह उम्मीद न की जा सकती थी कि जरूरत पड़ने पर वे एक ऐसे धर्म की मदद करेंगे जिसका असर उनके दिलों पर से चिलकुल उठ चुका था।*?
यही वजह थी कि मोहम्मद साहब की जिन्दगी में, सन् ६११ इसवी में, जब इरान के जरथुरत्री बादशाह ने रोम के फेले हुए राज पर हमला किया तो नाखुश इसाई पादरियों और इसाई प्रजा में से बहुतसों ने जगह जगह उन चिदेशी हमला करने वालों का साथ दिया जो एक ग्रेर इसाई धरम के मानने चाले थे |
इस तरह के धम ओर इस तरह के महन्तों से भोले भाले अरबों के अन्दर किसी तरह के सुधार की उम्मीद करना बेकार था, न इन लोगों से अरबों की कोई भलाई हो सकती थी। सुधार और मलाई की जगह यहूदियों और इंसाइयों की आपसी दुशमनी और लाग डाट से अरबों के जीवन को ओर उनकी आजादी को वहुत वड़ा धक्का पहुँचा | दूसरे धर्मों से नफ़रत करने में इंसाईं और यहूदी दोनों एक दूसरे से बढ़े चढ़े थे। पांचवीं सदी के आखीर में, अरब के एक हिस्से, यमन के एक यहूदी हाकिम यूसुफ् जुनवास ने उन सब लोगों और खासकर इंसाईं अरबों को जो यहूदी मत मानने से
* 0, ५०. ], ए. 3352-33.
अरवों का घर्म श्पू
इनकार करते थे तकलीफें दे दे कर मार डालना शुरू किया। इसमें उसका एक खास तरीका उन्हें धधकती हुई आग में फेंक कर जिन्दा जला देना था। यमन में उन दिनों इसाई भी काफो थे । यहूदियों की कोई सल्तनत अरव से बाहर न थी लेकिन इंसाइयो की एक जबरदस्त हकूमत यमन से थोड़ी ही दूर लाल समुद्र के उस पार इथियोपिया में सौजूद थी। यमन के इसाइयों ने बहुद्रियों के खिलाफ इधियोपिया के इसाइ बादशाह के साथ साजिश की | इथियोपिया के ब्रादशाह ने फौज भेजकर ज़नवास को मरवा डाला ओर यमन के सारे सूत्रे पर क्रजा कर लिया। यह बात मोहन्मद साहव के ज़न्म से सिफ सत्तर साल पहले की है । यमन का सूता मक्के से दक्खिन मे हैँ। यह अरब का सबसे जयादह पैदावार वाला ओर सब से ज़्यादह हरा भरा सवा है ओर लाल समुठ से इरान की खाड़ी तक फेला हुआ है।इस तरद उन दोनो धर्मों की आपसी लाग डाट की वजद से अरव के दविग्पन ओर पूरव का वहुत बड़ा हिस्सा विदेशियों के दाथ में गया ओर सन् ६१० इंसवी तक एक दूसरे के बाद चार दिदेशी हाशिस उस पर हकूमत करते रहे | नीचे की वात से यहदियों और इंसाइयों के झ्रापली मूंग
का कुछ ओर पता चलता हैँ। इसाइयों की फिनायों में लिग्या हैँ कि एक वार तीन दिन तक इसाइयो के पादरियाँ और चदिया के पुरोहितो भ॑ बहस हाती रही। पासिर में वरतदियान कहा--“अगर तुम्दारा इसा मसीह सचमुच आसमान पर झिन्दा
रद हजरत मोहम्मद ओर इसलाम
है तो वहां से उतर कर हमे इसी वक्त दिखाई दे, हम तुम्दारा थम मान लेंगे।” इस पर उसी दम बादल गरजे, विजली कड़की ओर एक लाल वादल के ऊपर हजरत इसा दिखाई दिये। उनके सिर पर भुकुट या और हाथ में नंगी तलवार । उन्हों ने आते ही यहूदियों से कहा--“देखो, में तुम्दारे सामने खड़ा हूँ, में, जिसे तुम्दारे पुरखों ने सूली पर चढ़ा दिया था |” देखते ही यहूदी सब अन्धे हो गए और फिर उस वक्त तक उनकी आंखें न खुलीं जब तक उन््हों ने इंसाई धर्म न मान लिया । /
इस सासले का असली रूप चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन यह उन दिनों के यहूदियों ओर इंसाइयों के आपस के मगढ़ों ओर उन इंसाइयों की घम की सूक वूक की खासी अच्छी तसवीर खींचता है जो हजरतां इंसा के हाथ में भी नंगी तलघार दे सकते थे ।
गरों की रध क ह्कमत 0 कक कक थे धरम के नाम पर इस तरह के अन्धेर और देश की इस नरह की हालत का देश की आजादी पर बुरा झसर पड़ना सरूरी था | अभी कहा जा चुका हैँ कि मोहम्मद साहव के जन्म हे सिफ सत्तर साल पहले यमन के हर भर सच पर इधियोपिया ये इसाई बादशाह ने फचजा कर लिया था। उत्तर ओर पल्डिम में रोम के राज ओर पूरव में इंरान की वादशाहत से भी अरच जी सरहद मिली हुई थी ओर इन दोनो विदेशी हकूमनों ने अपने अपने पएस रे ऋण इलाकों पर कब्ज कर ग्ग्या था। सिर अचबुल फुजल लिखते हैं-- धभमोहस्समद साहब की पेदाइश के वक्त रच का ज़्यादष हिस्सा विदेशियों के हाथों में था। शाम घोर इरान की सरहद से मिले हुए सचे कस्तुनतुनिया के रोमी सम्राटों ओर इरान फे खुसरो के कच्जे में थे। सक्के के दक्सिन में लाल सलुद्र थे किनारे का हिस्सा इधियोपिया के इसाइ वादशाहा के सानदुन था। लेक्नि हिजाज' का इलाझा शिसका सतल8 दांथ या
सर्प हज़रत मोहम्मद और इसलाम
“रुकावट? है अभी तक पूरी तरह उन क्लौमों की वदनीयती और हमलों दोनों को रोक रहा था जो उस इलाक़े के आस पास दुनिया की हकूमत के लिये लड़ रही थीं। इसी हिस्से की घाटियों में मक्ता ओर सदीना के वे पाक शहर हैं जिनमें से एक में इसलाम जन्मा ओर दूसरे में पतपा ।”*
उस रेगिस्तान को छोड़ कर जो आवादी के लिए .बेकार था सिफ एक हेजाज का इलाका ही अरब भर में उन दिनों अपने की आजाद कह सकता था, और आगे के बयान से पता चलेगा कि उस पर भी इन तीनों विदेशी ताकतों के दांत बरावर लगे हुए थे ।
अरबों में वहादुरी की कप्ती न थी | उन्हें आजादी भी बहुत प्यारी थी। कुरवानी था त्याग का माद्दा उनमें हद दरजे का था। मेहमानों की खातिर करना और अपनी आन पर मर मिटना भी उन्हें खूब आता था।
लेकिन वे भूठे चहमों ओर घुरे रिवाजों में डूबे हुए थे। आपसी लड़ाइयां और हत्याएं उनके आए दिन की जिन्दगी का एक जरूरी हिस्सा थीं। उनका सारा जीवन टुकड़े डुकड़े द्वो रहा था। उनका आगे जिन्दा रहना भी खतरे में था । उन्हें एक ऐसी महान आत्मा की जरूरत थी, जो उनके सब घुरे रिचाज़ों और
# ३6७ 56 श०ाञाएण्ल्त, 977 शाश्य है0पऐे रैथ्डो, [प्रा000०९४0०॥, ४. -2
ग्रेरों की हकूमत २९
चहमों के जाल को तोड़कर फ्रक सके , उन्हें अंधेर से निकाल कर उजाले में लाकर खड़ा कर सके, उनकी घरेलू लड़ाइयों को हमेशा के लिये बन््द्र कर उन्हें एक ढोरी में धांध सफे ओर सामने खड़ी मौत से वचा कर उन्हें तरक्की, भलाई और आजादी की तरफ ले जा सके।
इस तरह के देश ओर इस तरह के आदमियों मे मज्छे फे एक बड़े घराने के अन्दर तारीख ६ रवीडल अवब्बल, सोमवार, २० अप्रेल सन् ५७१ इसवी” को सूरज निकलने के वक्त मोहम्मद साहव का जन्म हुआ |
“मदमूद पाशा फ़लरी, सौरतुच्तदी, लेछवा शिएली, फिल्म एप, सफ्रा १६० |
मोहम्मद साहब का जन्म
कस
मक्के का शहर दुनिया के सब से पुराने शहरों में गिना जाता है | मोहम्मद साहव से एक हज़ार साल पहले यूरोप के साथ हिन्दुस्तान ओर दूसरे एशियाई देशों की तिजारत अरब ही के रास्ते होती थी। अरब सोदागरों की उन दिनों भारत के पूरवी ओर पच्छिमी किनारों पर वहुत सी खुशहाल चस्तियां थीं। अरच मल्लाह जो आम तोर पर यमन के रहने वाले होते थे हिन्दुस्तान ओर आस पास के देशों का माल अपने जहाज़ों में लादकर यमन ले जाते थे । वहां से खुश्की के रास्ते यह माल शाम जाता था ओर शाम से यूनान, रोम, मिस्र वरोरह देशों में | यमन ओर शाम के वीच पहाड़ियों से घिरा हुआ मकक्के का शहर है। इसी लिए तिजारत के खयाल से मक्का उन दिनों बहुत वढ़ा चढ़ा था | इस तिजारत से तरह तरह का लगाव रखने वाले बहुत से लोग मकक्के में और उसके आस पास वस गए। मक्का अरच का सब से वड़ा ओर सबसे खुशहाल शहर बन गया ओर एक तरह की ठीक ठीक हकूमत चहां क्रायम हो गयी।
बुर
मोहम्मद साहब का जन्म १
मक्के के चड़प्पन का दूसरा सवच काये का पुराना मन्दिर है। यह मन्दिर भी मोहम्मद साहव से कम से क्रम हजारों साल पहले से अरच ओर उसके आस पास के लोगों का सबसे बढ़ा तीय चला आता था। मक्क की घढ़ी हुड़॑ तिजारत ओर कार की पूजा इन दोनो के सबब मक्के के हाकिम का मान ओर उसकी धाक अरब सें शुरू से चढ़ी चढ़ी थी ।
मक्के मे सच से ज़्यादह इज्जत आवरू वाला कर्वी ला इन दिने कुरेश का क़वीला था। कुरेश का सरदार दी मकक््के के छोटे से राज का सालिक या हाकिम होता था ओर दही काये की देग्य भाल करता था। मोहस्मद साहब का परदादा हाशिम--जिसके नाम पर सोहम्भद साहब के खानदान के लोग बनी हाशिम' कद लाते थे--अपने जमाने में मक्फे का हाक्रिम था और लोग उसे बड़े आदर और प्रेम से देखते थे। हाशिम के बाद हारिम जा भाई मुत्तलिच ओर मुत्तलिव के बाद दाशिम का घेटा भच्दुल मु्चा गही पर वेठे। अच्डल मुत्तत्वचिच के कइ लड़के थे जिनस सदर छोटा लड़का अब्दुल्ला *५ साल की उम्र मे अपनी शादी छदी साल के अन्दर मर गया। अच्चुल्ला के मरने के हु रोज दाद अब्दुल्ला की वेदा आसिना ने बालक सोइन्मद दिया ।
बच » _हईर
हा | ८ २ के
पहले पत्चीस साल
धआामिना इतनी दुखी ओर चीमार थी कि वह सात दिन से ज्यादह वच्चे को दूध न पिला सकी | उसके वाद कुछ दिन तक अब्दुल मुत्तलिच के एक दूसरे बेटे अबु लद्दव की एक वांदी ने मोहस्मद को दूध पिलाया | फिर मकके के पास की एक पहाड़ी से साद क़वीले की एक औरत हलीसा ने बच्चे को अपने घर लेजाकर पाला | पांच साल की उम्र होने पर धाया हलीमा ने वालक को लाकर फिर माँ को सोंप दिया । लेकिन अगले साल ही माँ आमिना भी चल वसी | इस तरह एक बढ़े घराने में पेदा होने पर भी वालक मोहम्मद को माँ वाप का सुख न मिल सका |
वड़े होने पर मोहम्मद साहब ने कई वार भरे दिल से आपमिना की क्रत्र की यात्रा की | धाया हलीमा से भी जीवन में कई वार उनकी भेंट हुई ओर हर वार उन््हों ने हलीमा की तरफ गहरी सोहव्बत और इज्ज़त दिखलाई |
माँ के मरने के वाद कई साल तक दादा अब्दुल मुत्तलिच ने अनाथ मोहस्मद की देख रेख की, ओर उसके वाद अच्छुल
03
पहले पर्चार खाल |।
मुचलिव के बड़े बेटे अचु तालिव ने उन्हें पाला | क्रव इस साल की उम्र में मोहम्मद साहब का ज़्यादह वक्त मच्छे के खास पास की पहाड़ियों पर अचु त्तालिच की वकरियाँ चराने में बीना करता था। अब हम दो ऐसी बातों को बयान कर देना चाहने हें जिनज्ञा नौजवान मोहम्मद के दिल पर मालूम हांता है सब से गहरा असर पड़ा, ओर जिनसे अपनी क्रॉम की विगढ़ी हुई हालत का खाका उनकी आंखों के सामने खिंच गया। इनमें पहली दात मोहम्मद साहव की पेंदायश से भी ५५ दिन पहले की है, लिसका उन्होने बढ़े होकर दूसरों से हाल सुना। अरब का यमन सूदा इधियोपिया के इसाई बादशाह के फहजे में था। बादश'ह के हुकुम से यमन के इसाई हाकिस अबराहा ने एक चहन घर फोज लेकर जिसमें कई हाथी भी थे मफ्के पर हमला जिया ओर कावे को गिरा डालना और मकक््के को दइथियोपिया के वादशाह के राज में मिला लेना चाहा। यह हमला अरदो के धर्म और उनकी आज़ादी दोनों फे ऊपर एक सचरदन्त हमला था | हम ऊपर लिख चुके हैं. कि उन दिनों प्रर्द भर में ऐज्ञाज का इलाका ही पूरी तरह आऊाद था। मालम होता थधाएशि अवराहा की फ़ोज को कोई हृ॒रा न सफेगा। मजे दानों पा कहना है कि परमात्मा ने अबराहा की फोज़ पर घोई प्रचाने झाफत भेजकर इसे तितर वित्तर कर दिया। जग हो. इसमे शरऊ नहीं हज़ारों जानें गंदाकर 'पवराहय को मकके जे घाटर से ही राज ३
३४ इज्षतरत मोहम्मद और इसलाम
हाथ लौट जाना पड़ा | मोहम्मद साहब ने बचपन में इस बात की सुना । उनके दिल पर इसका इतना गहरा असर पड़ा कि कुरान के एक अलग सूरे में इस बात का ज़िक्र आता है। इस से अपने देशवाला की बेबसी और उनके सामने की आफ़त मोहम्मद साहब को दिखाई दे गई।
दूसरी वात उक्काज़ के मेले में हुईं। सन् ५८० ई० से उकाज़ के मेले के मोक़ पर मक्के से पूरब के एक हवाज़िन क़बीले के किसी शायर ने क़ुरेश के सामने अपने कबीले की बड़ाई का बखान किया । क्रैश से न सहा गया। दोनों तरफ़ से तलवारें खिंच गई | दोनों इस बात को भी भूल गए कि वे दिन, जैसा रिवाज चला आता था, लड़ाई वन्द् रखने के दिन थे। दस साल तक यह घरेलू लड़ाई जारी रही । कई कई क॒वीले दोनों तरफ़ से आ मिले। हज़ारों जानें गईं ।जिन दिनों ये लड़ाई जारी थी मोहम्मद साहब की उम्र दस ओर वीस बरस के बीच में थी। अरब के इतिहास (तारीख ) में इस दस बरस की जंग को «हरवे फ़िजार! यानी नापाक लड़ाई या अधम्म की :लड़ाई कहा जाता है, क्यों कि यह लड़ाई उस महीने में शुरू हुई जिसमें लड़ना मना था।
छोटी उम्र से ही मोहम्मद साहब को एकान्त में रहने ओर सोचने की आदत थी। जबकि उनके साथी खेल कूद में वक्त खोया करते थे मोहस्मद साहब कहा करते थे, “आदमी खेल
#7)
पहले पद्चीर दाल हे
कूद में वक्त खोने के लिए नहीं, किसी फ़्यादह ऊंचे मतलब के लिये बनाया गया है ।?”*
जब १२ बरस के हुए तो मोहम्मद साहब अपने ताया अडु तालिव के साथ एक तिजारती काफले में मक्के से पहली यार शाम गए । रास्ते में उन्हें कई यहूदी वत्तियों से होकर जाना पड़ा। इससे उन्हें इस ज़माने के यहदी घर्मं से खासी जानकारी हो गई। शाम का देश उन दिनों सोम के इसाई सम्राटों े मातहत था। वहां इसाई धर्म का झूव ज्ञोर था। मोहम्मद साहव को अपनी जवानी में कह धार शाम जाने पा मौका मिला । एक विद्वान लिखता हैँ कि “शाम में मोटस्मद ऊे सामने लोगों की घुरी हालत और धर्म की गिरावट का वह परदा खुल गया जिसकी याद उनकी आंख के सामने से फिरि कसी फीदी ने पड़ सकी ।””
शाम का देश जिसमे फ़िलस्तीन आर ययसलम शामिल थे दुनिया के सब से पुराने और सब से हरे भरे देशों में गिना जादा है। कहा जाता है कि शाम की घादियों से ज़्यादट पच्दे मंच दुनिया में फह्दी पैदा नहीं होते। यहदी घमं लो भव शाप न्यास वातें इसी देश में ह४ । घहत पहले जब दमश्क शाम छी राज
धानी था शाम एशिया की सदसे सुखी फोर उबरदस्त हृस्मतों में
"अप ७७३७८ ऋण ८नााल छा षिाामजम अर ... नकिकन+-ीरषम-- आन
>ग ॥6 5 ठग, 79७ के 3 फ्लो, 2 :( 90, ए 22
३२६ इज़रत मोहम्मद और इसलाम
गिना जाता था । शाम के इलाक़े फ्रीनीशिया में सदियों तक दुनिया भर की तिजारत की सबसे वड़ी और सबसे ज़्यादह भरी पूरी मंडियां थीं। सिकन्दर के बाद सदियों तक यह देश यूनानियों के हाथ में रहा और यूनान की बढ़ी हुईं विद्याओं, विज्ञान ( साइनस ) और दशन ( फ़लसफ़े ) के पढ़ने पढ़ाने की यह एक वड़ी जगह रही। सदियों इसमें सैकड़ों ही बौद्ध मठ थे ओर वैद्ध धम और बौद्ध दर्शन की घर घर चर्चा होती थी । शाम ने ही हज़रत इसा और इसाई धम को जन्म दिया। हज़रत इसा के तीन सौ साल बाद तक यह देश ज्ञान, विज्ञान, धन धान््य, दस्तकारी और तिजारत सबके लिए मशहूर था। लेकिन मोहम्मद साहब के वक्तों में वह कुस्तुनतुनिया के इंसाई सम्राट के हाथों में था और इंसाईं धरम का एक खास अडडा माना जाता था। सम्राट थियोडोसियस ने शाम के पुराने धर्मों यानी वाद्ध धर्म और यहूदी धरम को बुरा बताया, वहां के तमाम मन्दिरों को गिरवा दिया और हुकुम दे दिया कि,--“जो कोई आदमी सिकन्द्रिया और रोम के इसाइ पादरियों के वताए हुए मज़हयी असूलों को न मानेगा और उन पर न चलेगा उसका सब धन दौलत ज़ब्त कर उसे देश से निकाल दिया जायगा ॥” यह भी “हुकुम दें दिया गया कि “जो कोई यहूदियों वाले दिन इस्टर का त्योहार मनावेगा उसे मोत्त की सज्जा दी जावेगी।” हिन्दुस्तान, मिस्र, यूनान जैस देशों के विद्वान सदियों पहले
पहले परकौठ खाल 2७
मोहम्मद साहव का जन्म हुआ ठीक उस सदी में इसाह मदस्त सेए्ट आगमन्टाइन ने इस घात को इस लिये झूठ ठाराया क्यों कि इंजील में ज़मीन को चपटा लिग्ला था। हकुम दे दिया गया कि, “जिन किताबों में ज़मीन के गोल होने की घात चिसी शो उन्हें जला दिया जावे ॥?
मोहम्मद साहब के दिनों के पोप प्रिगरी ने साई धरम के उस निकम्मे पूजा पाठ और उन रस्म रिवार्जों छो, जिन्हें ऊपर थोड़ा सा बयान किया जा चुका हैँ. हकुम देकर, हमेशा के लिये असली इंसाई धम ठहरा दिया। लेकिन ये सच लचर दातें उन दिनों के यूनानी ज्ञान वि्तान की रोशनी में न ठटर सकती थी। इंसीलिये पोष प्रिगरी के बारे में लिखा है कि,--“दिद्या का उससे बढ़कर जानी दुशमन कभी कोए पेंदा नटीं #छग ।" उसने खुद रोम के मशहूर 'पेलेटाइन' किसलायथर को ध्यग ऋूगा दी और गणित ( रियाद्धी ), भूगोल ( हुगयाफ़िया ). ज्योतिद ( नजूम ), वैयक ( तवावत ), दर्शन ( झलसफा ) पढ़ाने बालो को देश से निकाल दिया। “दाशनिछों ( फिलासफरों ) को दृद ढुह॒ कर फत्ल किया जाने हूगा । जिस जिसी पुरानी किनाव को नफूल मिलती थी उस तुरत जला दिया ज्ञाता या। पच्छिमी एशिया भर में लोगों ने इस दर से छापने अपने शिताप घरा की सव कितादें अपन हाथों से ऊलादीं वि कहींजिसी किताव की किसी घात के लिए उनके सारे कुनये यो इन न पर
ज़मीन के गोल होने का पता लगा च॒के थे। जिस सदी में हू
फल शु
प्र इज़रत मोदम्मर और इसलाम
दिया जावे ”* बेद्य का पेशा करने वालों यानी दवाओं से बीमारियों का इलाज करने वालों की सज़ा मौत थी । हुकुम दिया गया कि बीमारों के इलाज के लिये ईसाई पादरियों ओर महन्तों के गण्डे तावीज़ और दुआएं काफी हैं। इंसाई पादरियों तक के लिये “बपतिस्मे के वक्त तीन बार पानी में डुवकी लगा लेना, शहद् और दूध मिला कर चाट लेना, कपड़े या जूते पह- नते वक्त माथे पर ऋ्रश का निशान कर लेना और मरियम और सन््तों की मूर्तियों के सामने धूप दीप जला देना” नेक चलनी के मुकाबले में कहीं ज्यादह ज़रूरी वातें समझी जाती थीं। जो आदमी इस वात को मानने से इनकार करता था कि हज़रत इंसा के जन्म से सैकड़ों साल पहले फिरओन ( यानी मिस्र का पेरोए ) जिस रथ में बैठ कर गया था उसके पहियों के निशान अभी तक लाल समुद्र के रेत में बने हुए हैं ओर समुद्र की लहरें या हवा के कोंके उन्हें नहीं मिटा सकते, उसे अधर्सी कह कर मार डाला जाता था।
इन सब वातों से पता चलता है कि शाम देश के उन लोगों को जो सदियों पहले यूनानी ज्ञान विज्ञान और वैद्ध दशेन का आनन्द ले चुके थे छुठवीं सदी के आखीर में ईसाई धम के नाम पर केसे कैसे जुल्मों ओर आफ़तों का सामना करना पड़
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पहले पच्चीठ साल ३९
रहा था। यह सब द्ालत लड़कपन में मोहम्मद साहव की नझर के सामने से गुज़री | कई घार कई बढ़े वंढे इसाइयों से उनकी वातचीत हुई, जिनमें एक ईसाई महन्त नस्तूर का खास तोर पर ज़िक्र मिलता है। पहली ही वार की शाम की चात्रा मे एक नेक ईसाई साधु बुहैरा का भी नाम आता है जिस पर बालक मोहम्मद के सवालों, उसकी गहरी सोज, उसके बड़े दिल, उसकी सूभा चूक और उसकी पहुँच का वहुत बड़ा असर पढ़ा |
सोहम्मद साहव की ज़िन्दगी के पहले २५ साल झपन नाया अचु तालिव के साथ तिजारत करने में और इसी तरद के नज रुबे हासिल करने में वीते। इन दिनों मोहन्मद साहब ने निजारत में इतनी होशियारी हासिल करली ओर अपनी समाहई और इमानदारी के लिये वह चारों तरफ इतने मशहर हो गए दि मकक्के के दूसरे वहुत से व्यापारी उन्हें प्रपना एमअए्ट चनांक्षर उनकी सारफत व्यापार करने लगे।
ग्रहस्थी
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इससे कुछ पहले शहर का एक वड़ा और मालदार सौदागर चल बसा | उसकी बेचा खदीजा को अपने काम काज के लिये एक दहोशियार ओर ईमानदार एजण्ट की ज़रूरत पड़ी। अबु तालिच ने अपने भतीजे की खुदीजा से सिफारिश की | खदीजा ने मान लिया | अब खद़ीजा के एजण्ट की हैसियत से मोहम्मद साहव कुछ दिनों शाम, दमश्क़ ओर दूसरे मुल्कों से तिजारत करते रहे | मोहम्मद साहव की सेहनत ओर ईमानदारी से खुदीजा को वहुतत लाभ हुआ | आखिर एक वार उनके शाम से मक्का लोटने पर वेवा खदीजा ने उनसे शादी करने की वात कही । वह राज़ी हो गए | मोहस्मद साहब की यह पहली शादी थी। दोनों की उम्र में वड़ा फ्रक था। सोहम्मद साहव की उम्र इस शादी के वक्त पच्चीस ओर खदीजा की चालीस थी | फिर भी यह शादी ज़िन्दगी भर दोनों के लिये वहुत चड़ी वरकत सावित हुई आंर आखीर तक दोनों में खूब श्रेम रहा। इस तरह मोहम्मद साहव की ग्रहस्थी शुरू हुई ।
अल-अमीन
आाटस्सटर
श्प साल की उम्र तक उस ज़माने के तमाम बयानों से मोदस्सद साहव की ईमानदारी ओर नेकचलनी का काफ़ी सबूत मिलना हैं। जब उनकी उम्र के लोग, मक्के में जेसा रिवाज था, शायरी करने और आवारा फिरने में अपना वक्त ग्योते थे. मोट्स्सद साहब को जब कभी अपने कारबार से फुरसन मिलती दह एकान्त में कुछ न कुछ सोचते दिसाई देते थे। मिलने जलने में वह सच के साथ चहुत ही मीठे यहां तक कि शरमील थ । इनका
रहन सहन बड़ा सादा, उनका मन उनके बस में. तन्दस्सी
अर जा 5 आओ
अच्छी, दिल मुलायम, ओर चेहरा चमवता एओआ था। लोग उन्हें देखकर ही उनकी तरफ खिंचने लगने थे
जवानी में ही अपनी सदाई पीर इमानदारी के ल्यि चह इतने मशहूर हो गए कि तमाम मजका झे लोग उस अल-अमीन', यानी जिस पर भरोसा क्या जा सफे, कह कर पुकारा करते थे और जिन्दगी के रगग्रीर तक बट १ नाम से पुकारे जाते रहे ।
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४२ इन्नरत मोहम्मद और इसलाम
मक्के की हकूमत का और सकक््केवालों के झगड़े तय करने का हक उन दिनों क़ुरैश के सरदार को था। लेकिन आए दिन बाहर से आने वाले यात्रियों ओर दूसरे लोगों के जान माल के वचाष का कोई इन्तज़ाम न था। मक््के के आस पास और खुद मक्के में अकसर इन लोगों का माल असवाच और कभी कभी उनके वाल बच्चे तक लूट लिये जाते थे, ओर कोई कचहरो नथी जिसमें जाकर वह दाद फक्रियाद कर सकें। मोहम्मद साहब से कई सो साल पहले फ़डल, फ़जाल, मुफडज़ल ओर .फुजेल नामके चार वहादुर और द्यावान नौजवानों ने मक्के के अन्दर इस पाक काम को अपने हाथों में ले रखा था। लेकिन उनके बाद फिर कोई इस तरह का वन्दोवस्त न रहा। मोहम्मद साहव ने अपनी शादी के वाद ही सब धघरानों के खास खास लोगों को जमा किया। उन्होंने एक दल बनाया जिसका काम सक्के में और उसके आस पास परदेसियों की जान ओर उनके माल की हिक्लाज़त करना था। उस दल के हर आदमी को इस बात की क्सम खानी पड़ती थी कि वह हर परदेसी की हिफाजत करेगा और किसी को उस पर जुल्म न करने देगा । पुराने जमाने के उन चार बहादुरों की याद में इस दल का नाम हिल फुल फ्ुजूल” रखा गया | यह दल कमर से कमर ६० साल तक काम करता रहा ।
अरब में उन दिनों ग़ुलासों के विकने का आम रिवाज था। कुछ लोग शाम के दक्खिन से किसी ईसाई क़बीले के एक
हा
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अऋल-अमान ई३े
लड़के को जिसका नाम जेंद था कही से पकड़े लाए। ऊँद मक्के के वाज़ार मे आकर विका। खदीजा के एक रिख्तेदार ने उसे खरीद कर खदीजा को दे दिया । खदीजा ने उसे मोज्मद साहव को दे दिया। मोहम्मद साहव ने जद की आजाद करके उसे बड़े प्रेम से अपने साथ रख लिया। छुद दिनों बाद ऊँद का वाप हारीस पता लगा कर मक््के पहुँचा। उसने जद को अपने साथ घर ले जाना चाहा। लेकिन फंद मोहन्मद साहब ऊे बाद से इतना खुश था कि उसने बाप के साथ जाने से इनकार कर दिया।
मोहम्मद साहब की उम्र जब क़तीव ३० साल की थी मझरे से एक बड़ी दरावनी भेद्र भरी बात ज्ञा पता चतला। दद यरे था। वुम्तुनतुनिया के सम्राट वे चहत सा माल रच छान उसमान नामी एक इसाए अरब के ज़रिये मकके आर देजाज पर हइदा
करना चाहा। पता लगते ही सोहन्मद साहब ने मणा वार्तों जे
च्न्न्कू
ओर खुद उसमान की आन, देशमति झोर उनका श्ययान
सुहद्वत ४ साम 6 धापानद श्प्ो मझाानस्झर ५-हां॥रींकप “६ अरलिली आस ज्डक की मुह््बत के नाम पर अपीज की 'प्र ४३4०५ *१|? - ९ की कोशिश से राम के सम्राट की वह चान इसदी पा ।
पांच सान बाद एक ओर बात हुई जो देखने में गत मामूली थी; लेकिन जिसके नतीजे प्ररद की पाद्यदी ये किए ऊपर की चाल से भी हुठु कम दुरे न हो सकते थे।त्स इस बात से इन बातों का भी पता चलता है डि मोहन्मद साहय
डड हज़रत मोहम्मद और इसलाम
कितने अमन चाहने वाले और कितने सूक बूक वाले थे, और अपने देश भाइयों में उनका सान कितना बढ़ा हुआ था ।
काव की कुछ दीवारें पानी की वाढ़ से फट गई'। मन्दिर की मरम्मत की जरूरत हुई्दें) मरम्मत के बीच में काबे के पाक पत्थर “संग्रे असचद” को फिर से ठीक जगह पर लगाने का सवाल उठा । यह पत्थर एक फुट छे इंच लम्बा, आठ इंच चौड़ा और बहुत पुराने ज़माने का एक अंडे की शक्त का टुकड़ा है जो मोहस्मद साहव के हज़ारों साल पहले से आज तक कावे की खास चीज़ है और दक्खिन पूरव के कोने में ज़मीन से पांच छै फुट की उंचाई पर लगा हुआ है। आज तक सब मुसल- मान यात्री इज्ज़त से उसे घूमते हैँ। कुरैश क़वीले की चार वड़ी वड़ी शाखों में झगड़ा होने लगा कि संगे असवद को उठा- कर ठीक जगह पर लगा देने की वड़ाई किसे दी जावे। मंगड़ा वढ़ गया। आखिर सबने मिलकर इस भगड़े के फ्रेसले के लिये अपने अल अमीन मोहम्मद को पंच वनाया। मोहम्मद साहव ने मौके पर जाकर अपनी चादर विछादी, उस चादर के ऊपर अपने हाथ से संगे असवद को रख दिया, फिर चारों खानदानों के चार सुखियों से कहा कि वे सव मिलकर चारों तरफ से उस चादर को ऊपर उठावें। इस तरह उन सबने मिल कर संगे असवद को ठीक जगह पर पहुँचा दिया। चादर को उस जगह के साथ मिला दिया गया ओर मोहम्मद साहव ने हलके से सहारा देकर संगे असवद् को उसकी जगह पर सरका
अलबनअमीन है $ 4 दिया। इस तरह एक ऐसा ऋणगढ़ा, जिससे नि ऋरशों में बड़ी आपसी लड़ाई छिड़ सकती थी, वल्कि जिसमें स्का सत्र क़व्ीले खिंच आ सकते थे और ज्ञो एक बड़ों सावित हो सकता था, आसानी से तय हो गया।
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एकान्त में रहना
अरव और आस पास के देशों के लोगों की हालत, उनकी आपस की फूट, उनके अजीव अजीव धम ओर रिवाज, ओर विदेशी हकूमतों के उन पर जुल्म, इन सब बातों पर मोहम्मद साहव शुरु से ही दुखी और सोच विचार में डूबे हुए दिखाई देते थे। अकेले में रहने की भी उन्हें शुरू से आदत थी । अब आकर उनके जीवन में एक नई बात दिखाई देने लगी ।
उनके दिल में शुरू से एक इंश्वर सें पक्ता विश्वास था। यहदी और इसाई विद्वानों ओर खासकर शाम के इसाई साधुओं से उन्होंने यह भी सुन रखा था कि लम्बे उपचार्सो ( रोज़ों ), श्राथनाओं, ठुआओं, ओर चुपचाप ठुख सहने से इश्वर अपने भक्तों पर दया करते हैं. ओर उन्हें सचाई का रास्ता दिख- लाते हैं। मोहम्मद साहब के दिल में इन सव धर्मों के लिये इज्ज़त थी । लेकिन इन घर्मों की उन दिनों की द्ालत को देखते
एकान्त में रहना कप
हुए उनकी तसली इनमें से किसी से न हो सकती थी। सर विलियम स्यूर लिखता है,--
“मोहम्मद साहव में शुरू सेट्टी सोच दिचार की आदत अर एक तरह की गहराई दिखाई देती थी | हाल में यद कर भी बढ़ गइ थी और वह अब अपना घहुत सा दक पाले में विताने लग गए थे | उनका मन घ्यान और सोच में लगा रहता था। अपनी फ़ीम की गिरावट का उनके दिल्त पर घड़ा वोम्द था। सच धर्म क्या है, इस तरह की उधल पुथन उनऊी प्रान्मा को दिक करती रहती थी। चह अकसर मक्के के पास पी सुनसान घाटियों और पहाड़ियों पर एकान्त में रहने, सोचमे ओर शान्ति हासिल करने के लिए चले ज्ञाते थे । उनदी सब मे प्यारी जगह हिरा पहाड़ की तलहूदी में इनार के ऊपर एक गुफा थी ।*+
हिरा फा ऊँचा और झनसान पद्दाद मक्के से उत्तर में ऐै। कई साल तक रमजान का पूरा महीना सोहस्मद साइन छा इसी पहाड़ की एक गुफ़ा सें धीतता रहा, कौर धीरे धीरे दर पी खोज में वेचन मोहम्मद के लिये यारटो महीने रमयान ही एे हो गए। इस शुक्का के प्रन्दर मोस्म्मर साएद ने ऋस्धे नाग उपदास रोज़े रसे, रतजगे जिये, दुआएं मांगी 'पोर दार घार उसी शुफा में वे अपने परवरदिगार पे सामने ऊी भर पर रोए।
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50 आर्ड सीकर वमजड,
दर इज्ञरत मोहम्मद ओर इसलाम
एक विद्वान का कहना है कि “जिस तरह हीरे धरती के पेट में अंधेरे में ही पाए जा सकते हैं, इसी तरह सचाई गहरे सोच से आत्मा की गहराइयों में ही मिल सकती है ।”
इस तरह वरसों के सोच ओर खोज से मोहम्मद साहव के दिल पर यह सचाई जमती जा रही थी कि ईश्वर एक है, वही हम सबका मालिक है, सब आदमी भाई भाई हैं, एक ईश्वर के सिवाय और किसी देवी देवता में सन अटकाना गुनाह है, सवको छुरे कामों से बचना ओर नेक कामों की तरफ लगना चाहिये, सवको अपने अपने भले और बुरे कामों का फल भझुग- तना होगा । यही उन्हें सव मज़हवों का असली निचोड़ दिखाई दिया और इस असली धर्म से भटक जाने में उन्हें अरव और वाक़ी दुनिया की सारी मुसीवत्तों की जड़ दिखाई देने लगी |
“सोहम्मद साहव को बहुत दिनों पहले से सूमने लगा था कि अरब के सेकड़ों क़वीलों और धर्मों के लोगों का अपने अपने क़वीलों और धर्मों के अलग अलग देवी देवताओं को पूजना ही उनमें फूट और मगड़ों के बढ़ने का खास सबब था। इसलिये जिस तरह मोहम्मद साहव से वहुत पहले यहूदी महा- पुरुषों ने कोशिश की थी उसी तरह मोहम्मद साहब ने सब से बड़े ओर सव के मालिक एक परमात्मा की पूजा के ज़रिये उन सव को पूरी तरह मिला कर एक क़ौम बना देने का इरादा कर लिया । परमात्मा के एक होने के ज़रिये ओर उसी एकता के
एकान्त में रहना छच सहारे मोहम्मद साहव ने अपने लोगों में एकता ऊफायम करने ओर ' उन्हें एक क्रीम बनाने का फैसला किया ।४*
अउधुश्ुता, विद िठाए जाप कैीफछॉपोएएी 35४ ' 9४ 5० किए (वा स्छाप्पऐ, $ 25-25 ०
इंश्वर की आवाज़
ब्कै०रर-
लेकिन इस तरह की गहरी ओर एक इश्वर ही पर भरोसा करने वाली आत्मा की तब तक तसल्ली न हो सकती थी जब तक कि यह आवाज़ उसके अन्दर से उठती हुई मालूस न हो, जब तक कि उसका वह रव्व, जिसके सामने उसने रो रो कर रातें गुजारी थीं, ख़ुद उसकी तसल्ली न करे | आदमी की अक्ल पर ही भरोसा नहीं किया जा सकता। आदमी इतना बेवस ओर कमजोर है कि वह विना परमात्मा की सद॒द के कर भी क्या सकता है ! फिर सच्चे खोजियों को इससे पहले भी तो इलहाम ओर आकाशवानी हो चुकी थी ! यही मोहम्मद साहब के दिल की बेचैनी का सवव था। यही इनके एकान्त में रहने, लम्बे रोज़ों और प्राथनाओं का मतलच था |
आखिर जब मोहम्मद साहव की उम्र चालीस साल की हुई एक रात रमज़ान ही के महीने में हिरा की गुफ़ा में बेठे हुए उन्हें यह आवाज़ आती हुई मालूम हुइई--/जा उठ ! और अपने रव्य का संदेसा दुनिया तक पहुँचा।” मोहम्मद की तसल्ली न हुई ।
ईश्वर की आवाज़ हु
फक.... ३
फिर एक रात को जब वह अकेले सोच विचार में दय पड़े थे किसी ने उनसे जोरों के साथ कहा “एलान कर !" मोहम्मद साहव चोंके | फिर आवाज़ आई “एलान जर !”? नीसरी बार आवाज़ आई “शेल्ान कर !” सोहम्मद ने धबरा झर पृद्ठा “क्या ऐलान करू १” जवाब मिना--
८४ऐलान कर अपने उसी रच्च के नाम पर जिसने ज़गत छो बनाया ।
“धज़िसने प्रमा॑ से प्रेम का पुतला आदमी तय्यार क्या, एलान कर | तरा रब्च बढ़ा ही दयावान है, उसने 'तादनी वो पालम के ज़रिय लान दिया ओर आदमी को व सब बाने सिर्गर छिन्हों चह नहीं जानता था ।"+
ये कुरान की वे पांच आने हूं जिनका मोहन्मद साटर को सबसे पहले इलदाम हुआ। यही इनके पेरास्दर' ( ईश्वर का पैंग़ाम यानी सदेसा लाने वाला' ) होने जो पहल थी ।
इलहाम, चह्दी, रिविलेशन, प्राज़ाशयानी था शंबर णा संदेसा क्या चीज़ें ६ ? सचाद झा कोई ऐसा भगदार ९ या नागें
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कौ है हत
जिसका साया आदमी णे दिल के संजन भंजदे इस दिल एी रस सफाई की हालत में कभी इस दिन्त पर ग्यास रूप से प7 सफ्दा
०». ७+९०५५७-२७०५०७ ववर०५० एस नयार-काणातमकपक ५ -- पक .3>म« >ऊ न नणय ना 5 रन 20७७७७७४७७एएएाकंर्श कण न्ब्क जा ०4०. ० एमीक९७०५ वीके च्
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पूर हज़रत मोहम्मद ओ्रोर इसलाम
हो ? आत्मा की कोई ऐसी हालत हो सकती है या नहीं जिसमें थोड़ी देर के लिये ग़ेव से यानी किसी ऐसी जगह से जिसके बारे में कुछ कहा ही नहीं जा सकता उसके भीतर ज्ञान का दरवाज़ा खुल जाता हो (--ये सब ऐसे सवाल हैं जिनकी ज़्या- दह गहराई में जाना इस वक्त हमारे मतलब से दूर है। लेकिन इसमें शक नहीं मोहस्मद साहब का इलहास का दावा दुनिया के धर्मों के इतिहास में कोई अनोखी चीज़ न थी। दुनिया के ज्यादह तर धर्मों के क्रायम करने वालों, और हजारों ऋषियों, महात्माओं, पीरों, पेग़म्बरों ओर वलियों ने किसी न किसी रूप में इसका दावा किया है और वेद, तौरेत, इंजील सब के करोड़ों मानने वाले अपनी अपनी किताबों को इलहामी यानी ईश्वर की कही हुई मानते हैं। इसमें भी शक नहीं कि खोजी ओर बेचैन मोहस्मद को ठीक उसी तरह ओर उसी तरह की हालतों में अपने भीतर से या अपने परमात्मा से रोशनी मिली जिस तरद्द दुनिया के किसी भी बड़े से बड़े पेग़म्बर, दृष्टा या धर्म चलाने वाले को कभी मिली है। इसी रोशनी में मोहस्मद साहब को अपने देश, अपनी क्रोम ओर सारी इन्सानी क़ौम के भले का रास्ता नज़र आया ओर इसी ने उन्हें अपने मिशन को फैलाने ओर उसके लिये हर तरह की तकलीफ उठाने को तय्यार कर दिया ।
“सचमुच शअ्रगर कभी कोई अ्दमी मौत की तरह अ्रटल बने रहकर अपनी लगन का सज्चा था तो अरब भूमि का यह वफ़ादार बेटा था।
है
ईश्वर की आवाज घू्
अगर कभी किसी श्रदर्मी ने दुनिया के पैदा झरने वाले के सामने '्रण्ना दिल और अपनी आत्मा खोलकर रखदी तो इस व्यापारी मोट्म्मद ने रख दी थी। उचमुच श्रगर दुखों में दूबी हुई और उन्हें चुपचाप राटती हुई किसी आत्मा को कमी भी दसारे बनाने वाले रख्च था दर्शन था
है तो द्वाजरा नामी दाठी की इस ओऔलाद बे हृ॒प्ा
एक अनोखे असर ओर जोश में मोहम्मद साहय ने ऊपर की पांचों आयतों को साफ साक्र कह ढाला | श्स पर भी उनमें अपने होश हवास पर भरोसा न हुआ | वह त्वियत से यएुत ही लजीले भर लिखा है कि औरतों से भी उयादद शरमीले' मे । खदीजा से उन्हें गहरा प्रेम था ओर खदीजा को उनन्से। स्यद्रीज्ञा की समम बूक ओर सचाद पर भी उन्हें भरोसा था। सुगैजा की उम्र अब फरीव ५५ साल थी। मोहन्सद साटथ पररश/॥ृए खदीजा के पास पहुँचे और सब दाल सुनाढार ऋगने पे “सदीजा ! मुझ क्या हो गया ? भें को पागल नो नह हो गया १” खदीज़ा ने जवाब दिया--/ए कासिन! के दाप डरो मत, तुम घड़ी खुशी फी रबर लाए हो। में ए८ से टुसे अपनी क़ौस का पैशस्थर समझगी। छुश शे पे: ! हल ण्मी तुम्हे शरमिन्दा न होने देगा । क्या तुम सदा 'पपने रिग्लेदासा
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| >ककामणक-2+न्कन७“िना, कम /2० अप... चेक सी जरकक.. ररन्था+ ली ५>सफर3. 9-२. न्याान््क. पक सीकाजी... समा न्# 4 >क-साागे-+3आन्मूछन्क.. जया. स्ी+मरनएन्औ गरम नये, बकरा जे, कक टाशपक जज | भर - पिरिकेक--ननरीय-> तन ५. फकैर+->>२०३७१५०नककि
+ बुत नि कैताओों ए्ते छीक्याए१ए! 3०५७४, 985 9 ण' २ ७5 7.0०४ए, 72? 60-:0 मोहम्मद सरद पा एज दबेदधा रो इचपन मे ही भर मंण था ।
0७.७० 2२०० "किम.
पूछ हज़रत मोहम्मद और इसलाम
साथ प्रेम का सलूक करने वाले, पड़ोसियों के ऊपर मेहरवान, ग़रीवों को दान देने वाले, मेहमान की खातिर करने वाले, अपने वचन का पालन करने वाले ओर हमेशा सचाई के तरफदार नहीं रहे !?
खदीजा का एक रिश्तेदार वरक़ा यहूदी और ईसाई धस की कितावों का विद्वान् सशहूर था । वह बहुत बूढ़ा ओर अन्न्धा था ओर आसपास वड़ी इज्जत की निगाह से देखा जाता था। खुदीजा जल्दी से वरक़ा के पास गई। उसने वरक़ा को सव हाल कह सुनाया। चरक्ता ने ध्यान से सुनकर जवाव दिया कि “घम की किताबों में ऐसे ही मौक्ते पर एक इस तरह के पैग़्म्बर के भेजे जाने का जिक्र हे। सचमुच वही फ़रिश्ता जो हज़रत मूसा के पास आया था मोहस्मद के पास भी आया है। मोहम्मद से कहदो घवराए नहीं, हिम्मत के साथ अपने मिशन को पूरा करे।”?
विद्वान वरक़ा के तसल्ली देने का मोहम्मद साहब पर बहुत वड़ा असर पड़ा | लेकिन चह फिर भी मेले कुचेले कपड़े पहने, सोच विचार में डूबे हुए एक चादर लपेटे पड़े रहते थे। छे महीने की जवरदस्त वेचैनी के वाद फिर एक दिन आवाज़ आई--
ऐ चादर में लिपटे हुए !
उठ और लोगों को आगाह कर
ओर, अपने रव्व की बड़ाई कर
ओर अपने कपड़ों को साफ़ कर
इंश्वर की आवाज़ धूछू
ओर, मैले पन से चच ओर दूसरों की सेवा करने फे लिये किसी पर अद्दनान मत जना ओर अपने रू्वके लिये सन्न से काम ले।*
करन, >पस..ल्माओबममममानतः भायानकथममेकरकान +०+ ७७. धरम केममन..3++मी-+-.. गानीयोकाे- कक... डड हज पनबीमी कक हनन 24 पी... थन्म...3+ का जय कम सनक कमियां बा व्यापार ७७8 .4+अगेत -उाम्थ उलट नमक. जज
मिशन शुरू इस घड़ी से ही मोहम्मद साहब को अपने मिशन का पूरा यक़्ीन हो गया। उनकी बाक़ी उम्र अपने जीवन की इसी ग़रज्ञ को पूरा करने की कोशिशों में खच हुई। उन्हों ने अब दुनिया के ओर सब कामों से अलग होकर मक्के में लोगों को अपने इंश्चर का संदेसा सुनाना शुरू किया।
; थोड़े में दूसरे सब देवी देवताओं ओर मूर्तियों की पूजा को । छोड़ कर एक इश्चर की पूजा करना, ऊँच नीच ओर क़वीलों के . फ़रक्त को तोड़कर सव आदमियों को भाई भाई सममना, जुआ, । शराब, चोरी, वदचलनी और लड़कियों की हत्या जैसे बुरे कामी- । से बचना और नेक कामों में लगना यही इसके वाद से मोहम्मद
” साहव के उपदेशों का निचोड़ था ।
गान,
मुसीबतों के तेरह साल
त्तीन साल की लगातार मेहनत के बाद मुशकिल से चानीस आदमियो ने मोहम्मद साहब के धर्म को माना। इनमें पदले पांच
डी
खदीजा, अबु तालिव का छोटी उम्र का घेदा खली, पद, फव बना ओर उसमान थे। अचु चक्र एक मालदार सोदागर थधे। बारी ग़रीव और छोटे लोग ज़्यादह थे श्रार बहुत से उन शुलामों में से थे जो उन दिनो अरब मे जानवरों की तरद बच जाने थे । मोहम्मद साहब ने सफा नाम की पहादी पर फुरंशा की एफ सभा की और उनसे और सच देवी देवताओं को दोए एर सिर एक झअल्लाह की पूजा करने को कंद्ा। लोगों छो छुरा रूगा। मोहम्मद साहव की हंसी उड़ाते हुए थे सप सपने एरपने पर
चले गए।
के छा रू यक क े कुछ दिन वाद उच्दों ने फिर सिय पपने रगनदान छे यानी अच्दुल मुत्तलिव की नसल के लोगो को 'फपने मन पर जुस्स
७5 )-स अं... के. ्ः
तने छा किया | खूब सममकाया। लेक्नि सिदाय 'गती णे छिसी से इन वात न सुनी ।
'पूट हज़रत मोहम्मद और इसलाम
मक्का वालों की उम्मीद छोड़ कर उन््हों ने अब वाहर से आने वाले यात्रियों की तरफ़ ज्यादह ध्यान देना शुरू किया।
कुरैश अब उनके खिलाफ हो गए। कुरैश की ज्यादह् आमदनी, ओर बहुतों की रोजी काबे के ३६० देवी देवताओं की पूजा से चलती थी । यही उनकी कमाई थी। इसी में सक्के का वड़प्पन था। और इसी पर मोहम्मद साहब का सब से वड़ा हमला था। हजारों साल से जमे हुए विश्वास ( अक्ीदे ) आसानी से नहीं दूटते । क्रैश ने हर जगह मोहम्मद साहब की वात काटना शुरू किया।
जहां कहीं मोहम्मद साहब जाते उनका मज़ाक़ उड़ाया जाता, उनपर फवतियां कसी जातीं, उन्हें गालियाँ दी जातीं। जब वह उपदेश देने खड़े होते उन पर पाखाना ओर मझुरदा जानवरों की अंतड़ियाँ ' फेकी जातीं। लोगों से कहा जाता “अब्दुल्ला का बेटा पागल हो गया है, इसकी मत सुनो ।” ओर शोर मचाकर कोशिश की जाती कि कोई उनकी बात न सुनने पावे । कई बार उन्हें पत्थर मार मार कर घायल कर दिया गया। एक बार कावे के अन्दर मोहम्मद साहव पर हमला किया गया ओर अगर अब वक्र ने न वचाया होता तो उन्हें वहीं खत्म कर दिया जाता | जब इन सव बातों से काम न चला ओर मोहम्मद साहव न रुके तो फिर उन लोगों को, जो मोहम्मद साहव की बातें मान कर उन पर अमल करने लगते थे, तकलीफ दी जाने लगीं ।
कृषि
मुीदतों के तेरद सात भू
विलाल नामी एक हन्ती ग़लाम को, जिसने मोग्स्सद साहब के कहने पर मक्के के बु्नों की पूजा करने से इनऊझार ऋभ दिया था, तेज़ धूप मे जलते हुए रत पर लिया कर एक भारी पन्यर उसके ऊपर रख दिया यया आर कहा गया कि मोगस्मद पा सा छोड़ कर फिर से अरब के पुराने देवताओं ही प्रजा शुरू करो। विलाल ने न माना | इस पर कह दिन नऊझ उसे इसी तरह सताया गया। आखीर मे जब अब वक्र का पता चना नो उन्हीं ने परमन देकर विलाल को उसके मालिकों से खरीद लिया ग्थूर शिर आजाद कर दिया।
यासिर ओर उसकी दीवी समीझा दाना को इसी गुना मे बरछियां भोंक भोंक कर मार डाला गया | इनके पद प्स्मार रो भी इसी तरह के हुः्य दिये गए। प्रस्मार ने एज दार पप्रा कर माफी मांग ली ओर फिर सोहस्मद सादद दे पास जाएर धपनी कमज़ारी के लिये पद्ुताना पार रोना पु शिया मो स्शद साहब ने उसे माफ कर दिया आर णिर पपनी मे मिला शिया ।
इस शुरू ज़माने छे एसलास में गायों वो हमी ने मत ।
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६० हज़रत मोहम्मद और इसलाम
मोहम्मद के एक कांटा भी चुमे में खुद अपने सब चाल बच्चों, कुनबे वालों ओर माल असबाव समेत मिट जाना पसन्द करूंगा |” खुबैब के डुकड़े टुकड़े कर दिये गए। मांस की एक एक वोटी हड्डियों से अलग कर दी गई । खुबैब शहीद हो गया। पर एक परमेश्वर ओऔर उसका संदेसा लाने चाले पर यक्नीन खुबैब के दिल या जवान से न उठ सका । इन दिनों अबु घक्र ने वहुत से ग्ुलामों को, जिन््हों ने इसलाम घमं मान लिया था और जिन्हें इसी क़सूर में उनके मालिक तरह तरह की तकलीफ पहुँचाते थे, अपने पास से पैसा देकर आज़ाद करा दिया।
सन् ६१५ इसची में मोहम्मद साहव को अपने घम का उपदेश करते पांच साल हो गए। सो सवा सो आदमी जिनमें ग़रीब ज्यादह थे उनके मत में आ चुके थे। क्रैश की ढुशमनी दिन दिन बढ़ती जाती थी। मोहम्मद साहब ओर उनके साथियों की जान हर घड़ी ख़तरे में थी।
अरब और खास कर भकक्तके में कुरैश का ज़ोर था। लाल समुद्र के उस पार थोड़ी ही दूर पर अफरीका में इथियोपिया का इसाई सम्राट नज्जाशी बड़ा दिलिवाला माना जाता था। सन् ६१५ में पहले १५ मुसलमान अपनी जान वचाने के लिए मकक्के से इथियोपिया चले गए ) धीरे धीरे चहां उनकी तादाद १०१ तक पहुँची जिनमें १८ ओरतें थीं। क्ुरेश ने अपने दो आदमी अम्र ओर अब्दुल्ला इथियोपिया के सम्राट के पास कीमती क़ीमती नज़राने देकर भेजे ओर उससे यह चाहा कि वह
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मुठीदतों के तेरद् दाल हृ
मुसलमानों को पनाह न देकर उन्हे मण्के दापिस भेजे | समर; ने मुसलमानों को अपने दरवार में चुलावा और इनेे मार घा ओर उसके क्रायम करने वाले के बारे मे सदाल ऊिये। इस पः अली के बढ़े भाई जाफर ने इधियोपिया के सम्राट के सामने उूं बयान दिया वह अरथों की उन दिनों की हालत और मोहएन्मः साहव के उपदेशों की वी अच्छी तसवीर है। जाहर ने सकता से कहा--
“ऐ राजन ! दम लोग जंगलीपन कोर ना रुममझी में दबे रु. थे। दम छुर्तों की पूजा फरते थे, नापाक छिन्दिगी दिलाने मे, मर्द खाते ये और गन्दी वातें मुंह से बोलते ये | झ्रादमी मे लिएनी पा बातें दोनी चाहियें उन सब से इसने संद मोद रखा था। हम परोल:
झोर परदेसियों दोनों की तरफ प्रपने दम में बर्बाद पे। हुस ८7 दी क़ानून जानते थे श्ौर बद था 'लिसक्ी त्वढों उसकी २२ । ऐश
दालत में ईश्वर ने एम ही में एक ऐसा आदमी रा एर दिए हि ज़ानदान, जिसकी उचाई, जिटकी ईमानदारी घोर गण घाब रण: को एम पदले दी से जानते ये | उठने रमे ददाया हे हफार एप घोर उपदेश दिया कि इक्काद णे साथ विरी दूररे को ने गो, उग: दमें दूसरे देदताश्रों या इ॒तों दी पूरा परने से मगा दिया, पर शा बोलना, पमानत में दग्यानत ने गरना, दूदरों पर दणा इरनगा, थी: पह्ोसियों ऐ हहें या रापात राना हमारा धमे दरगाणा, हगगे एम
क्द्धा कि पिसी को भी मां पतन हे रा
५० ्क्ड ह हार ह्इाए रु) पद्म दे परलयकलक दिसी दताथ 4९) | ४५ दपत माल (५॥ श्बण्स 0१५ (०, है ४४ क कक.
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६२ हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
पापों से भागो और बुराई से बचे रहो, नमाज़ें पढ़ो, ज़कात ( दान ) दो और रोज़ा रखो | हमने उसकी बात मान लो है, और सिफ़ एक निराकार ईश्वर की पूजा करने और उस ईश्वर के साथ ओर किसी को न जोड़ने के बारे में उसके कहने पर अमल करना शुरू कर दिया है | इसीलिये हमारी क़ौम वाले हमारे ख़िलाफ़ खड़े हो गए उन््हों ने हमें दुःख पहुँचाए. कि हम एक निराकार की पूजा को छोड़ कर फिर से लकड़ी, पत्थर और दूसरी चीज्नों के बुतों को पूजने लगें। उन्हों ने हमें इतनी तकलीफ़ें दी ओर इतना चुक़सान पहुँचाया कि जब हमने देखा कि हम इनके साथ सलामती से नहीं रह सकते तो हमने आपके देश में पनाह ली। हमें भरोसा है श्राप उनके जुलमों से हमें बचावेंगे ।??#
आए हुए कुरैश के आदमियों ने नज्जाशी से शिकायत की कि मुसलमान हज़रत ईसा को खुदा का बेटा नहीं मानते । वाद- शाह ने जाफर से पूछा। उसने कुरान की वे आयते पढ़कर सुना दीं जिनमें हज़रत इंसा को पैग़म्बर माना गया है। दूसरे कहर ईसाइयों की तरह नज्जाशी खुद भी किसी को खुदा का बेटा. न सानता था। नज्ञाशी पर ईसाई रिफ्रास्मरों एरियस ओर नेस्तोरियस के आज़ाद विचारों का असर था। इन सत्र बातों का नज्ञाशी पर इतना अच्छा असर पड़ा कि उसने मुसल- के सम कक लक टलनल कल
6 5970 ० 789॥; 97 5960 #77॥7 ४7, ??, 00-0]
मसीदतों के तेरद खाल ६१
माना को क़रेंश के हवाले करने की जगह अपन यद्ठां दटरा लिया ओर करंश के आदमियों को उनके फीमती नद्धरानों समेत रन वापिस कर दिया ।
मोहम्मद साहब ने उस इसाडई बादशाह के ऋद्मान को हमेशा याद रखा | चहुत दिनो वाद जब उसके मरने की साएर उन तक पहची तो उन्हों न उसकी आत्मा की भलाई के लिये टीद: उसी तरह नमाज़ पढ़ी ओर दुआ मांगी जिस नरह वे मुसलमानों के लिये मांगा करन थ। लस्जिन करश टइशसमनी घ्ग्र र5 आोर भी भड़की ।
जब आर कीड चाल न चली तो करंशा ने लोभ देंसर काम निकालना चाहा। फरेश के कूद मंखिया सोहस्सद सादइद हें पास आए। उन्दहोंन मोहम्मद पर दिश में झिसाए रण छप देनः, 'घरों मे फूट डाल देने', धाप दादा ेे धन पो दरा जाने', शोर अपने दंदताओ की बराह दरन जा रुचएाम नगाया ।
मोहम्मद साहव रूद फरश थे। लेक्नि वे इन साप्र प्रीलों के
फरक की ही मिटाना चाहने थे। सलाम पे बच्ञान के झीरे आते ही फरेशा शोर रोर फरेश, प्परव पार हल, गरम पर मालिक सव दरगावर हॉजात पं फोर सूप ए साय एरएमा भाप होने लगता था। पमंटी छरेश इसे फेस स्था ऊरयोे थे। उनों मे मोहन्मद साहव से फटा मि हम सप पने उपर टैफ्स मागाउर तुम्दे फवीले छा सार से मोलगर गगामी बना पेंसे।। पास
ह खा समादेका पी पी. हीषयान-नीकभूक
ठम्द पापना सरदार सान सगे “दरार छुसना ला ए। एकऋाु 75:
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काम न॒करेंगे। तुम सिफ्र अपने इस नए धर्म का उपदेश देना बन्द कर दो ।” मोहम्मद साहब पर इसका कोई असर न हुआ । उन्हों ने जवाब दिया---
“में भी तुम्दारी तरद सिर्फ़ एक आदमी हूं।पर मुझे! ईश्वर से यह इलदहाम हुआ हे कि हमारा तुम्द्दारा ईश्वर एक ही है, इसलिये उसी की तरफ़ मुंह करो और उसी से माफ़ी चाहो | उन लोगों पर अफ़सोस है जो ईश्वर के साथ दुसरों को जोड़ते हैं, जो गरीबों, दुखियों को दान नहीं देते, जो मौत के वाद की ज़िन्दगी भें और इस बात में यकीन नददीं करते कि सबको अपने किये हुए का फल भुगतना पढ़ता है। लेकिन जिन्हें यक्नीन है ओर जो नेक काम करते हैं उनके लिये सुख दी सुख हैं |?!
दूसरी वार ये लोग मोहम्मद साहव से फिर मिले और उसी तरह का लालच दिया ॥ मोहम्मद साहब का जवाब वेसा ही साफ़ था--
“मुके न पैसा चाहिये और न राज, में तुम्हें सिफ़े अपने ईश्वर का संदेसा सुनाना चाहता हूं। जो ठुम मेरी बात मान लो तो इस दुनिया में और दूसरी दुनिया में दोनों में ठुम्दायर॒ भला होगा, अगर न मानो तो मैं सत्र कर लुंगा और अल्लाद सब का फ़ेसला करेगा [?”
# कुरान ४१,६-८. प कुरान ३८,९६ इत्यादि.
मुठखीदतों फे तेरद साल ध््पू
लोगों ने मोहम्मर साहव से कद्ा कि तुम पेंगस्थर हो सो कुछ करामात दिखाओ ।? मोहम्मद साहव ने ज़वाद दिया--
“अ्ल्लाद की वारीफ़ करो ![ में कोर चीज़ नदीं, टियाय एक आदमी के, खुदा का भेजा हुआ [77
धुझसे पदले भी पघ्ज्लाद ने झजितने रदूल भेले ह॥ै दमारी तुम्दारा ही तरद जाना खाते थे और गरहियों भे चाएते फिरते थे |? *
मोहम्मद साहव ने अपनी ज़िन्दगी भर कभी न छोइ करामात, सोजज्ा या चमत्कार दिसाया और ने दिशा सकने का दावा किया। छुरान में कम से कम ६७ थार दिए शाता है कि लोगों ने मोटम्भद साइव से पोर करामास दिखाने के लिए कहा झौर उन्हों ने एर घार था हरुण्र कि में फोई करामात नदी दिखा सकता श्लणार पर डिया. चह हमेशा अपने को सिफ एक मामूली प्यादमी घसाते थे । उन्हें दावा सिफो इतना था कि ईश्वर ने मेरे घट (प्रिन )४ अन्दर सचारे का उजाला किया है प्रोर में जो तमसे छा रहा हैं वद॒ उसी क्य संदेसा है।' 'दपने उपदेशों मे घए दनेसोों से
भी फाम लेते थे ।
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* कुरान १७.९३, ॥॥ ] । क्री दर धू ९ रे &ः ता
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६६ हजरत मोहम्मद और इसलाम
“न मेरे पास अन्लाइ के ख़ऩाने हैं, न में ग्रेव का इल्म रखता हूं, न में फ़रिए्ता हूं, में सिफ़ उसी पर चलता हूं जो अल्लाह ने मेरे घट ( दिल ) में वैठा दिया है |”
“भरा अपना नफ़ा या नुकसान तक मेरे दाथ में नहीं है, जो अज्लाह चाहता है वही होता है। जो में ग़रेब जानता होता तो मुझे सचमुच ख़्ब फ़ायदा होता और मुझे! किसी तरद का नुकसान न पहुँचता । में तो सिफ उन लोगों के लिये जो मेरी वात मान लें बुराई से डराने वाला ओर भलाई की खुश ख़बरी देने वाला हूं |!
क्रैश के सरदारों ने अब ओर कोई चारा न देख मोहम्मद साहव के ताया अचु तालिव से कहा कि अगर आप अपने भत्तीजे को इस काम स न रोक लेंगे तो उसकी ओर उसका साथ देने वालों की जानें सलामत न रहेंगी |
चूढ़े अचु तालिव ने भतीजे को घुलाकर समरकाया कि इतने लोगों को अपना और अपने कछुनवे वालों का दुशमन बनाए ' श्खना अच्छा नहीं है । मोहम्मद साहव ने समझ लिया कि अब चाया मियां भी अपना हाथ मेरे सर से हटाना चाहते हैं। उन्हों ने ऊवाब दिया---
“उस अल्लाह की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, अगर वे सूरज को मेरे दाहिने हाथ पर और चाद को मेरे वाएं हाथ पर रख दे
तब भी जब तक अल्लाह का हुकुम हैं, में अपने इरादे से न हटंगा ।” # कुरान ६,५० |
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$97 ७, रैपप८ |
कि आज]
मुर्सीदतो झ नरह सान ६0
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यह कह कर भोहस्मद साहब रोने लगे ऋार मिर दट भर चल दिये। अथु नानलिव मुसहृमान ने हुए थे।प्पिर भी मनीऊे की हिम्मत और इसके झांसझों दोनो का उन पर गारा सर हुआ। उन्हाँ न वनी हाशिम छो हछ्ट्टा ररके समकाया शि-हमांः खान माहस्मद से मिले या न मिले हमें 'डदलकी जान धथानी चाहिये, वह हमेशा यतीमों और देज्सों झा मददगार छोर छापने फाल झौर फेल का सचा रहा हैं ।" सिवाय एप पठ नाएय के ओर सच ने सान लिया ।
उन ही दिना भें हज़रत उ्मर हा सलाम धसम को सामने लेना भी एक मारक की बात थी। जो मुसलमान एथियोपिदा चले गए थे इनको छोड़कर सुशण्लि से पचास "सग्सी मागन्सए
७ कक... न्क जा हक श्र साहव के साथ मकके भे ओर थे। एनमे से भी बात से "पपन क्र £.॥ ब्क नए दीन को छिपाए रखते थे कौर शाप मोग्ल्मए सार, रस!
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2० घर भें जे . फरार २ के दाह शक अर इस ; 8 ३४-०9, “३७4४४ व्सिी ४४ ४४ सं ध्ोर कभां छिः दा प: #_६ ८-०१, “९, दि 8 आय आय ऋ्. ५ छत. कक अपने घम की इउपद्श दर थे |
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धुसते ही वहनोई को गिराकर उन्हों ने उसकी छाती पर पैर रखा ओर उसका काम तसाम करने ही को थे कि वहिन वीच में आगई। एक वार में उन्हें ने बहिन के चेहरे को भी लह लोहान कर दिया | वहिन ने बिना घवराये या पीछे हटे बड़ी शान्ति के साथ जवाब दिया---
“अल्लाह के दुशमन ! क्या तू मुके इस लिये मारता है कि में एक रुच्चे ईश्वर को मानने वाली हूं! तेरे रहते और तेरे जुल्म सदकर भी मैं इस सच्चे धमें पर डटी रहूंगी | हां, में कद्दती हूं सिवाय एक ईश्वर के कोई दूसरा ईश्वर नहीं है, ओर मोहम्मद उसका रचूल है। उमर ! ले अब अपना काम पूरा कर |?
उमर के दिल पर असर हुआ। उनका हाथ रुक गया। वह सोच में पड़ गए | उनकी आंख क्रूरान की कुछ आयतों पर गई जो पास ही किसी चीज़ पर लिखी हुई पड़ी थीं। कुरान का यह वीसवां सूरा था। वे उसे यूंही पढ़ने लगे। फिर फिर पढ़ा। इरादा बदला | बहिन और वहनोई दोनों से माफ़ी मांगी | चाहर निकलते ही वह खज्लर की जगह दिल लेकर मोहस्मद साहब के पास पहुँचे और तुरन्त इसलाम धस अपना लिया |
उन्हीं दिनों के आस पास मोहम्मद साहव के एक चचा हमज़ा ने जो पहले उनके कट्टर दुशमन थे, इसलाम अपनाया | लिखा है कि “मोहम्मद साहब को उन दिनों जितनी तकलीफ दी जाती थीं ओर जगह जगह उनकी जो वेइज्ज़ती की जाती थी ओर जिस शान्ति और धीरज के साथ वह उस सब को
मुीदनों के तेरट साल ६९
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सहते थे उस देखकर हमज़ा के दिल पर इतना ऋसर ठप कि चह कट्टर दुशमन स बदल कर पणा साथी दां गया ।* रुसी तरह को ओर भी वहुत सी मिसाले उन दिनों की मिलती ६। माहम्मद साहथ की नए मन का दपदंश फरन सास्जा साल था। अभी तक मक्के की गलियों में इनकी जान खतरे में राइती थी | यह देखकर शअ्रतु तालिव ने और बनी हाशिम झानरान ८ दूसरे लोगो ने सोचा कि मोहम्मद सादव और उनके धरम मानने वालो को लेकर बह मक्के से पूरव थी एड एसी नंग घाटी मजा बसें जहां कोई आसानी से उन पर एमला न कर सके । इस घाटी को “छाबु तालियव जा शेव" फाने थे । मोहम्मद साहव, उनके साथी शोर एुनवे चाल सब दाएं 'लामर रहने लगे । फ्रेश के दो बड़े छानदानों चनी हाशिम 'णर बनी उस्ेया में पहले से ही लाग टाट बली ध्णती थी। ८घनी शाशिश णो छोड़ कर आर सब फरेश मोहम्सद साहएव के रिलाम पे।ध्नी उमया भी थे । बनी इमेया णी तरह से एण लिग्पाइट णारे मे टांग दी गयी जिसमें प्यौर सब करेंशा णो सम मी गे थी हि
जब तक चनी हाहिम भोहसमर णा साध ने एव कार दस सजा के लिय थाणी फरती एफ जदांलं ने कर ह भर मजा धन
(ाशिम से लेन देन, स्णना पीता, ब्याह शादी झए रह शा
'फमपरणन पक न... है] कसा... इनमे, फृम्ऋआानणयात ियेआन. सकी. पो.2«.. आयाम कामना मेज... अगवा... धद#ीग मिली, न््फ फीकियारक. अऑनोंग ना. न क््+ बा
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७० हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
चलन बन्द कर दिया जाबे। तीन साल तक बनी हाशिम मोहम्मद साहब को लिए हुए उसी छोटी सी घाटी में वन्द रहते रहे । उनमें सोहम्मद साहव के घराने के ऐसे लोग भी थे जिनन््हों ने अभी तक इसलाम धर्म नहीं अपनाया था। सिरफ़ अपने घराने की आन और सोहस्मद साहव से अेस के सबब वह उनका साथ दे रहे थे। इन तीन साल के कड़े वाइकाट से मोहम्मद साहब आर उनके साथियों को काफ्की दुःख उठाने पड़े, यहां तक कि कभी कभी इन लोगों को कई कई दिन का फाक्ता हो जाता था।
अरव सें यह रिवाज चला आता था कि कावे के मन्दिर की यात्रा के महीनों में अरबों के सब आपस के भगड़े थोड़े दिनों के लिये वन्द हो जाते थे। उन ही दिनों इन लोगों को भी वाहर निकलने ओर खाने पीने का सामान जमा करने का मौका मिल जाता था | उन दिनों में ही मोहम्मद साहव को भी उस घाटी से निकल कर वाहर के यात्रियों में खुले अपने मत को फैलाने का मौक़ा मिलता था | तीन साल के बाद कहा जाता है कि वह लिखावट जब इतनी फीकी पड़ गई कि पढ़ी न जा सकती थी तव अचु तालिव के कहने सुनने से ज्यों त्यों कर यह वाइकाट खत्म हुआ |
मोहम्मद साहब अब ५० वरस के हो चुके थे। अपने धर्म का उपदेश करते उन्हें दस चरस बीत चुके थे पिछले तोन बरस के वाइकाट के वाद उस्मीद की जा सकती थी कि वे वे खटके मक्के में रह सकें ओर आज़ादी से लोगों को अपने
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कुछ दिन बाद ही इनके सबसे बड़े मुरब्धी ओर प्रेमी अब
तालिव जा निया को चइठ शगछ तालितव िमममापममोकानपजा.. डवाननममपफ बा सॉडसॉ०००७-ह के तालव टानया स उठ गए। अबु तालित उस चक्त ८५० साल रे अपर हा चुक थ |
तदालिद नें दे 25 डक पीले ककननपक कम उलकल लक अंकल
“४“औअत्रु दालित ने अपने भमतीज के लिये आपने और अग्ने सार
००७ नर. कुल्क ् ् घरान के ऊपर जिस तरद्द का आर्स़्ता का
| +थ्ण
प् कि अदु तालिव मोहम्मद साहब के घर्म को नहीं मानता था.
॥ धरा ड्दछ [2] क्का ख्वूत <्र सलतां रा 42.७ अह् ता।जलनऊ+ 4 कितनी मम, >अन लि. जज 2022 +णाक उस बाद का रछ लता हैक अदछ्ु ताल कितना जचा तदपत का - पाक अल 5५ थ किक [4० दिल क्वा झ््तिना दहादर कम अर कक ०३, 9 फिंतनं बड़े दल का, पितना वहाटुर आर बहितदा बनाम
अंग. #०, च्क बिक; ग छा क् नह अआादमा था। ठाय हा इस बात न मदम्मद टादद के दिल का शझाई
कक
का सी पका पता चलता ई, क्योंकि किसी जुद॒शरत् घोसबाल के लिये अच्ु तालिव कमी इस तरह की आफन में न पता, और ऋदु तालिव के पास मोहम्मद साहब को परखने के लिए जाए जऊुरियेपे (७
“जब कि अछु ठालिव को इस्लाम के पैग़म्बर के मिशन मे पक्नोन
न यथा, पैमम्बर को इस अचम्मे में डालने वाल्ती है, ओर मोदम्मद साइद
49९, कर, हल ्ध 5, तरह हह्ाज्नतन बरभे मे उठछका शह आए हुर
। 4
# झ्ण ह्ऋान दर उबर, ५ ज० है) ० ३ दे पु ]
वहुत 'कानमाारूण उनका अ, 25... वह >> पट. दालदव 4७ 3.5. ष्ज्श्ट्न्क जि क ४ 8, यह बहुत बड़ा उदृत है ।& बह अडठु तालब जन सपस्दस्त शार सबच थ् पर इतना राहर +न्नपअर ावप्यटुरकाय>नभीजन पक यूकरा... साफ पानुस्ममकरन्यकक- ०७ बी आदमी पर इतना गहरा अठर डाऊ सके |! आयु तालिव को मर अभी तीन िन ने हुए थ कि मारन्मद
#०० का
साहब की दूसरी वड़ी मददगार, इनको रुप साल का साथ
प् (९ 6 फेएिशिव ६८, 0७ कछैय-मेश: -४४७५- स्(जशश्या
७२ इज़रत मोहम्मद और इसलाम
खदीजा भी चल बसी | खदीजा के मोहम्मद साहव पर बड़े बड़े अहसान थे | “अपनी इस व्याहता अहसान करने वाली के साथ उन््हों ने बड़े ही प्रेम के, शान्ति के और अच्छे दिन बिताये थे, उन्हें उससे वह सच्ची मुहब्बत थी जो किसी दूसरे के साथ न हो सकती थी |”* मरने के वक्त खदीजा की उम्र ६५ साल की थी। इतिहास ( तारीख ) गवाह है कि मोहम्मद साहव ने खदीजा के जीते जी अपने घर में या अपने दिल सें किसी दूसरी ओरत को जगह नहीं दी। अपने ऊपर खदीजा के अहसानों को याद करते हुए एक बार खदीजा के मरने के बरसों वाद मोहम्मद साहव ने कहा था--
“अल्लाह जानता है उससे (ख़दीजा से ) बेहतर और बढ़ कर मेहरबान जीवन की साथी कभी कोई नहीं हुईं | जब में ग़रीब था उसने मुके मालदार बनाया, जब लोग मुके भ्ूंठा कहते ये उसने मुझपर यकीन किया, जब दुनिया मेरे ख़िलाफ़ थी और मरे तकलीफ पहुँचा रह्दी थी उस वक्त उसने सच्चाई के साथ मेरा साथ दिया ।”
खदीजा से मोहम्मद् साहब के दो लड़के ओर चार लड़कियां हुईं । दोनों लड़के छोटी उम्र में ही खदीजा की ज़िन्दगी में मर गए । लड़कियां मौजूद थीं ।
अलु तालिव और खदीजा दोनों की ऐसे चक्त में मोत
मोहम्मद साहब के ऊपर चहुत बड़ी आफ्रत थी। अबु तालिव कएनु&063, जछा०-ज्रण४ए थावे (6 जला छल्ला४०५ए, 99 ४ण798 (96,
मुठाबतों के तेरद छाल छ्रे
के मरते ही कुरेश ओर खास कर दो क्रैश सरदारों अचु सुफियान ओर अछु जहल ने फिर मक्के के अन्दर मोहम्मद साहव का रहना सुशकिल कर दिया। एक दिन जब मोहम्मद साहब उपदेश देने के लिये नगर में निकले तो उनके सिर पर मेला डाल दिया गया। घर पहुंच कर मोहम्मद साहब की एक चेटी जिसने उनका सिर धोया इसे देख कर रो पड़ी | मोहम्मद साहच ने उसे तसल्ली देते हुए कहा--“सेटी वेटी ! रो मत ! सचमुच अल्लाह तेरे वाप की सदद करेगा ॥”
मकक्के में मोहम्मद साहब का काम ज़्यादह नहीं बढ़ रहा था । उन्हों ने सक्के से फोई ६० मील दूर तायफ़ नामी शहर में जाकर उपदेश देने का इरादा किया। अपने वफादार साथी ज़ेंद को वह अपने साथ ले गए | तायफ उन दिनों अरब थुत परस्ती का एक वहुत चड़ा गढ़ था। देवी लात? का वहां एक वहुत बड़ा मन्दिर था ओर उसकी खूब पूजा होती थी ।
कई दिन के सफर के वाद मोहम्मद साहब ओर जद तावफ पहुंचे | वहां के बड़े बड़े लोगों से मिलकर मोहस्मद साहू ने उन्हे अपना धरम समझाया जिसमें खास चौज़ एक निराकार को छोड़ कर ओर सब देवी देवताओं को पूजा फो छोड़ देना ओर नेक काम करना धा। किसी पर कोई असर न पढ़ा। फिर उन्हों ने गत्रियों में खड़े होकर उपदेश देना शुरू किया । जहां वह बोलने खड़े होते लोग उन्हें चुरा भला कहने लगते । शोर मचाकर उनकी आवाज़ वन््द कर दी जाती। कई दार
पक हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
उन्हें पत्थर मार मार कर घायल कर दिया गया। कई दिन चह वहां उपदेश देते रहे, लेकिन रोज़ यही हालत होती। आखिर एक दिन लोगों ने उन्हें ज़वरदस्ती शहर से बाहर निकाल दिया | कई मील तक लोग मज़ाक़ उड़ाते और गालियां देते उनके पीछे गए। “पत्थरों की मार से उनकी दोनों टठांगों से लह वह रहा था ।” ज़ेद ने उन्हें बचाने की कोशिश की, जिसमें एक पत्थर ज़ेद के सिर पर भी लगा। शहर से क़रीव तीन मील दूर आकर लोग वापिस लौट गए । मोहम्मद साहव और जेद थक कर एक पेड़ के साए में वैठ गए । थोड़ी देर के वाद मोहम्मद साहब ने घुटने टेककर जिस तरह अल्लाह से दुआ मांगी वह यह थी---
“ऐ, मेरे रव्ब! अपनी कमजोरी, अपनी वेबसी और दूसरों के सामने अपने छोटेपन की में ठुक द्वी से शिकायत करता हूं । तू ही सब से बढ़कर दयावान है | निबलों का तू ही वल है। वू दी मेरा मालिक है | अब तू मुझे; किसके हाथों में सौंपेगा ! क्या इन परदेसियों के हाथों में जो मुझे चारों तरफ़ से घेरे हैं ? या उन दुशसनों के द्वार्थों में जिनका तूने मेरे घर के अन्दर मेरे ख़िलाफ़ पल्ला भारी कर रखा है ? अगर तू मुझसे नाराज़ नहीं है तो मुझे कोई सोच नहीं, मे तो समभता हूं तेरी मुझ पर बड़ी दया है | तेरे दया भरे चेहरे की ज्योति (नूर ) ही में मैं पनाह चाहता हूं। उसी से अंधेरा दूर द्वो सकता है ओर इस दुनिया और दूसरी दुनिया दोनों में शान्ति मिल सकती है । तेरा गृस्ता मुझ पर न पड़े । जब तक तू खुश न हो, गुस्सा करना
मुसीवर्तों के तेरह साल 'ह्पू
त्तेरा काम हैं। तुमसे बाहर न किसी में कोई वल है और मे कोई ओर चारा !??
मोहम्सद साहब के पास सिवाय परमात्मा के या अपन भीतर के विश्वास के अब कोई सहारा न था। तायक से इस तरह निकाले जाने के बाद अगर वे मक्के जाते तो उनकी हालत ओर भी घुरी होती। वह कई दिन तक जंगल से रहे, ओर जेद को मकके भेजकर उन्हो ने वहां एक जानने वाले का घर अपने रहने के लिये ठीक किया। कई वरस तक वह इसी घर मे रहे और सिफ कावे की यात्रा के दिनो में बाहर निकन ऋर बाहर से आने वाले यात्रियों में अपने घम का उपदेश देते रहे |
एक दिन यात्रा ही के दिना में जब वह मक््के से कुछ उत्तर में अकवबह की पहाड़ी पर उपदेश दे रहे थे यसरव” के कुछ यात्रियों का ध्यान उनकी तरफ गया। मोहम्मद साहब दे; इप- देश और उनकी सच्चाई का इन लोगो पर असर हुआ । इनमे से ६ आदमियो ने इसलाम धर्म अपना लिया ओर अपने शहर जाकर, जो मक््के स २८६ सील था. लोगों से मोटन्सद साहब के उपदेशों का चचा किया।
अगले साल उनके साथ छै ओर आझादमी यसरव से पऋण। ये यसरव के दो बड़े कवीलो आस झोर सज़रज छे खास लोगो मे से थे। इन्हो ने भी इसलाम धर्म अपना लिया
_अरल-सत्पाल+ मम >जनननरापन 3. पर पप-मका>बप का कमलपन पक. जज >ब. टीन... पहामणकम्फ-क-प--3./>+सकफे-मन--५०>का॑अ ३ ५० म पका. पि+-५०माक ००.
“जिसे बाद में लोग 'मदौना' ददहने लगे।
७६ हज़रत मोहम्मद और इसलाम
ओर दस्तखत कर के नीचे लिखे बचन लिख कर मोहम्मद साहब को दे दिये--
४हम एक ईश्वर के साथ किसी दूसरे को न जोड़ेंगे । यानी एक इंश्वर के सिवा किसी दूसरे की पूजा न करेंगे। न चोरी करेंगे न बदचलनी करंगे। न अपने बच्चों की हत्या करंगे। न जान बूमकर किसी पर भूठा इलज़ाम लगाएंगे । न किसी ऐसी बात में जो अश्रच्छी होगी, पैगम्बर के हुकुम को तोड़ेंगे । ओर सुख दुख दोनों में पैगम्बर का पूरा साथ देंगे |”
इसलाम के इतिहास में यह “अक्रबह का पहिला वादा” कहलाता है।
यसरब के लोगों के कहने पर मुहम्मद साहव ने अपने एक समभादार साथी मुसअ को इसलाम धर्म फैलाने के लिये उनके साथ यसरब भेजा । यसरव में एक साल तक सुसअ्ब ने जिस होशियारी और धीरज के साथ अपने धम को फैलाया उसकी वहुत सी मिसालें मिलती हैं।
' एक बार सुसअब किसी के घर में बैठा कुछ लोगों को उपदेश दे रहा था। इतने में उसेद नामी एक आदमी भाला लेकर उस घर में घुसा और कहने लगा--“तुम लोग यहां क्या कर रहे हो ? तुम कमज़ोर दिमाग़ के आदमियों को उनके धर्म से गिरा रहे हो ! तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो यहां से भाग जाओ।” मुसअब ने बड़े ठण्डे दिल से जवाव दिया--“बेठ जाइये आर हमारी बात सुनिये, अगर हमारी बात सुन कर आपको
मुसीवतों के तेरद साल ७७
अच्छी न लगे तो हम यहां से चले जांयगे ” उसेद ने अपना भाला ज़मीन में गाड़ दिया ओर बैठ कर सुनने लगा। मुसअब ने उसे इसलाम के घुनियादी असूल सममाये और कुरान के कई हिस्से पढ़ कर सुनाए। उसेद पर बहुत बड़ा असर हुआ | कुछ देर बाद उसने कहा--/इस धम में में किस तरह शामिल हो सकता हैँ १” मुसअब ने जवाब दिया--“ज्ाकर नहा- इये, ओर फिर आकर कहिये और मान लीजिये कि सिवाय एक खुदा के दूसरा कोई खुदा नहीं है और मुहम्मद उसका रसूल है।” उसेद ने ऐसा ही किया और वह मुसलमान हो गया।
इसी तरह की ओर भी बहुत सी घातें मुसझवब के यसरव में धम फैलाने की मिलती हैं । नतीजा यह हुआ कि चसरव में मुसअब का उस्मीद से कहीं बढ़कर काम हुआ | घर घर नए धम का चरचा होने लगा | अगले साल सन् ६२२ इसवी में, मुसअझच के साथ ७० और आदमी उनमें से जिन््हों ने इसलाम धर्म अपना लिया था कावे की यात्रा के दिनो में मझा आए। उनऊजा इरादा था कि सोहम्मद् साहव को यसरबव ले जाकर मझा वालो के ज़ल्मों से उन्हें चचादें। मोहस्मद साहव के दिल में भी मा छोड़कर यसरव मे अपने नए धम की फिल्मत आजमाने का खयाल पैदा हो चुका था।
आधीरात को उसी अकचरह की पहाड़ी पर बातचीत हुई । पिछले साल के वादे मे ये टुकड़ा और जोड़ दिया गया--
ध्द हजरत मोहम्मद और इसलाम
५हम लोग (यसरव में) पैग़म्बर ओर उसके साथियों कौ उसी तरह हिफाज़त करेंगे जिस तरह अपने वाल बच्चों की करते हैं |?
सबने क़सम खाई । इसे “अक़्रवह का दूसरा वादा! कहते हैं ।
मोहम्मद साहब ने अब अपने साथियों को लेकर यसरव में जा वसने का फ़ेसला कर लिया। लेकिन खुद शहर छोड़ने से पहले वह अपने सव साथियों को वहां भेज देना चाहते थे । दो दो चार चार कर उनके बहुत से साथी धीरे धीरे यसरव के लिये चल दिये | मोहम्मद् साहब, अबु वक्त ओर उनके घरों के लोग मक्के में रह गए |
क़ुरैश को इस का पता चला। उन्हों ने सोचा ऐसा न हो कि वहां जाकर मोहम्मद का वल्ल और बढ़ जावे और कभी वाद में हमे और हमारे शहर को मोहम्मद से ओर ज्यादह नुक़सान पहुँचे | क्रैश की ठुशमनी ओर भड़की । अबु सुफियान मकके का हाकिस था। उसने क्ुरेश के सरदारों को जमा करके तय कर दिया कि सोहम्मद को शहर स ज़िन्दा न निकलने दिया जाय । अगर कोई एक आदमी मोहस्मद की हत्या करता तो यह डर था कि बनी हाशिम खानदान के लोग या मोहम्मद के साथी उस हत्या करने वाले से और उसके खानदान वालों स बदला लेते | इस लिये तय किया गया कि हर खानदान का एक एक आदमी जाकर एक साथ अपने अपने खंजर मोहम्मद के बदन सें भोंक दे ।
मुसीवतों के तेरद साल (७९
रात को य सव॒ लोग मोहम्मद साहब के मकान के पास जसा हो गए। इनकी सलाह थी कि ठीक सुबह को ज्यों ही मोहम्मद साहव घर से निकलें उन पर हमला किय जाय |
दीवार के एक सूराख से इन्हों ने मोहम्मद साहब को विछोने पर पड़ा देख लिया था । मोहम्मद साहव को पता चल गया। उन्हों ने अली को अपनी जगह चिछोंने पर चिदा दिया। उसके ऊपर अपनी हरी चादर डाल दी और छुद रात ही को पीछे के राम्ते घर स निकल गए |
मोहम्मद साहब सीधे अबु वक्त के घर गए। रातों राद दोनों सक्के से पेंडल निकल कर शहर से तीन चार मील दुर एक पहाड़ी शुफा के अच्दर जाकर छिप गए | नीन द्विन तक ये लोग इसी शुफा में रहे ओर चोथे दिन ऊंटो का दन्दोंवस्त दरफे यसरव के लिये रवाना हो गए |
इस वीच में क़रंश ने एलान कर दिया था किजोभी मोहम्मद को ज़िन्दा या मुरदा नलाकर पेश करेगा उसे एक सो ऊंट इनाम में दिये जादेंग। वबहत से घुढ़ सदार चारो नरझ उनकी खोज मे निकले | अपना पीछा करने वानो से कह जगह चाल वाल बचने मोहम्मद साहय सोमवार ८ रवीइल अव्दल. २० सितम्बर सन् ६२२ इसवी को यसरव पहुँच। थोड़े दिन बाद मोहस्मद साहव ओर पअथ घक्र के घरवाले भी उनसे आाकर मिल गए। विजजश््धः)?कफनकि
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प्र० हजरत मोहम्मद और इसलाम
यसरव वालों ने मोहम्मद साहब की वड़ी आवब भगत की ओर उनके आने की खुशी में अपने शहर का नाम 'यसरव” से वदल कर 'मदीन तुन्नवी” यानी “नवी नगर” रख दिया। इसी से वाद में “मदीना” नास पड़ा ।
इसलाम के इतिहास में यह वही “हिजरत” है जिससे मुसल- मानों का हिजरी सन् शुरू होता है ।हिजरत का मतलब ( घम के लिये ) अपना घर छोड़ कर दूसरी जगह जाना है । इस दिन से ही मोहम्मद साहव ओर इसलाम दोनों की ज़िन्दगी में एक नया द्रवाज़ा खुलता है ।
कहा जाता है कि मुहम्मद साहव के मदीना पहुँचने से पहले कोई डेढ़ सौ मुसलमान मक्के से वहां पहुँच चुके थे। कुछ को मक्के वालों ने जबरदस्ती पकड़ कर रोक लिया था । जो लोग मदीने गए उनमें से कुछ को अपना धर्म वचाए रखने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ा था। इनमें सुहैव नामी एक यूनानी था । सुददैव पहले एक गुलाम रह चुका था। उसके मालिक ने उसे आज़ाद कर दिया था। आज़ाद होकर सुहेव ने मकके में तिजारत शुरू की। थोड़े दिनों सें वह मक्के के मालदार से मालदार सौदागरों में गिना जाने लगा। जब उसने मुसलमान होकर सक्के से मदीने जाना चाहा तो मकक्के के लोगों ने उसे सिफ इस शर्त पर जाने दिया कि वह अपना सारा धन, दौलत ओर सारी जायदाद मक्के ही में छोड़ जावे और उस से हमेशा के लिए हाथ धो बैठे | सुहैच ने ऐसा ही किया। उसने अपना
मुखीवर्तों के तेरह साल प्र
सारा धन और माल मक््के ही में छोड़ दिया लेकिन अपने पेग़म्बर का साथ न छोड़ा ।
सन् ६१० इसवी से ६२०२ इसवी तक १३ साल के अन्दर जिस सज़बूतती, विश्वास, धीरज और हिम्मन से, तरह तरह की मुसीवर्ते मेलते, मोहम्मद साहव ने उस सचाई के फैलाने को जारी रखा जिसे वह अपने देश ओर दुनिया दोनो के दुखों का एक ही इलाज समभते थे, दुनिया के इतिहास में वह एक अनोखी चीज़ थी | इन १३ साल के अन्दर ले देकर क़रीब तीन सी आदमियों ने उनके धर्म को अपनाया जिनमें १०१ इथियोपिया जा चुके थे और बाकी बहुत से अब प्पने घर वार और अपनी जायदादें हमेशा के लिये छोड़कर अपने पैग़म्बर के साथ मदीने आगए थे ।
“अरब के पेग्रम्बर ने लगातार १३ खाल तक दर तरफ़ से किस तरह की नाउम्मेदी, धमकियों, वेपरवादी और तकलीणें का सामना करते हुए, अपने विश्वास को अ्रटल रखा, लोगों को बुरे व्यमों के लिये पछुताने का उपदेश दिया श्लीर अपने शहरवालों को जो एक श्यर के मानने से इनकार करते पे ईश्वर के गुस्से वा धर दिलाया, उस सारी कोशिश की दूसरी मिसाल दुनिया के इतिहास के छठ़ों में दडने पे भी नहीं मिलती | थोड़े ते वफ़ादार मरदों और औरतों को साथ लिये, और अपनी झागे की जीत पर भरोद्य रसते हुए, बट गए ल्गट
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प्पर हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
की वेइज़्ज़्वी, धमकियों और मुरखीबतों को धीरज के साथ बरदाश्त करते रहे [7११ ५
[| १(६ 0 (०00287776, एए 9 फ्रशाड्राए प्पा, ४० 70, 727? 374-35
मदीने में राजा की हेसियत से
_०-॥००॥शडिकाक:[ एंकर बक--_
सदीने पहुँच कर धौरे धीरे मोहम्मद साहव और इसलाम दोनो के दिन फिरने झुरू हुए। इसलाम के मानने वालो की तादाद जोरों से चढ़ने लगी | इनमें दो तरह के लोग ज़्यादह थे । एक वह जो मक्के से आए थे ओर 'मोहाजिरः यानी दिजरत करने वाले कहलाते थे ओर दूसरे वह मदीना वाले जिन्हों ने इन्हें मदीना बुलाकर पनाह दी थी ओर जो अन्सारः यानी भसददगार! कहलाते थे | चहुत से मोहाजिर इस चक्त घेसामान ओर बेघरवार के थे। मोहम्मद साहव की सलाह से एक एक अन्सार ने एक एक या दो दो मोहाजिर को ऊपना भाई चनाकर अपने घर से रख लिया | इस तरह एक नया 'भाईचारा' सदीन में घन गया और अन्सार और मोहाजिर में एक दूसरें से श्रेम घढ़ता गया। पहले कुछ साल तक यह रिवाज्ञ रहा कि ऊच कोई ऐसा अन्सार मरता था जिसने फिसी मोहाजिर को 'ऋपना “भाई” बना रखा था तो उसकी सारी जायदाद उस मोदामिर
य््ड हज़रत मोहम्मद और इसलाम
को मिल जाती थी। वाद में इस की जरूरत न रही और यह रिवाज वन्द हो गया।
मदीने के दो सबसे बड़े क़वीलों चनी ओऔस ओर घनी खज़रज में १२० साल से लगातार लड़ाई चली आती थी । शहर में कभी किसी का जोर होता था और कभी किसी का | नतीजा यह था कि शहर का अमन, शहर की सुख शान्ति हमेशा खतरे में रहती थी। अब इन दोनों क्बरीलों के जो ज्ञो लोग नए धर्म को मानने लगे उनमें इस पुराने झगड़े की जगह एकता ओर प्रेम दिखाई देने लगा। इस तरह सदियों की इस फूट ओर १२० साल की लड़ाइयों के हमेशा के लिये मिट जाने ओर शहर में फिर से सुख ओर शान्ति क्रायम होने की आस वंधी । जहां न कोई सरकार थी और न कोई हाकिम, जहां सिवाय तलवार के आपस के रगड़ों के फेसले का कोई तरीक़ा न था, वहां अब मोहम्मद साहव के ज़रिये एक ठीक ठीक सरकार क्रायम होने लगी, ओर इच्साफ्र के साथ लोगों के झगड़े चुकाए जाने लगे। इस सव से इसलाम के फैलने में वड़ी मदद मिली |
मोहम्मद साहब के उपदेश देने ओर मुसलमानों की नमाज के लिये अब एक अलग जगह की ज़रूरत हुईं। दो यतीम भाइयों ने अपनी जुमीन मुफ्त देना चाहा। लेकिन मोहम्मद साहव के हुकुम से अचु वक्त ने उन्हें क्रीमत दे दी। खजूर के ध्पनगढ़ तनों के खम्भों पर खजूर ही की टहनियों ओर पत्तियों
मदीने में राजा की देसियत
से एक चहुत वढ़ा छप्पर छा दिया गया जिसके इधर उघर ओर गारे की दीवारें खड़ी कर दी गई। यही मदीने की सबसे पहली मसजिद थी। उसका एक हिस्सा परदेसियों के ठद्दस्न ओर बेघर के लोगो के रहने के लिये छोड़ दिया गया। रात्त को रोशनी के लिये बहुत दिनों तक तल दत्ती की जगह रफ्जूर की छिपटियां जला दी जाती थीं।
कुछ ही दिनों में शहर की हकूमत का सारा बोक मोहम्मद साहव को अपने ऊपर लेना पड़ा। अरब के दूसरे नगरों के हाकिमों की तरह मदीने का हाकिम भी वहां के सब झानदानों के मुखियों की राय से चुना जाता था। मुसलमानों की नजरों में मोहस्मद साहव से बढ़कर कोई दूसरा हाक्षिम न हों सकता था। जिन लोगों ने इसलाम अभी तक नहीं अपनाया था चह भी घनी ओस ओर धनी खजरज क्री १२० साल पी घरेलू लड़ाइयों स उकता गए थे | इसलिए मदीने के सथ नहोगों ने मोहम्मद साहब को, जो अभी तक “अल पमीन' कालाते थे, क़रीव करीव एक राय से शहर का शाकिम घचुना। ध्स बोक की अपने ऊपर लेते ही मोहस्मद साहथ ने शहर फे कोगों के नाम एक ऐलान निकाला जिसके छुछ हुकड़े ये घे--
“अल्लाद के नाम पर जो उबफे कपर दया परने दाला ता है। प्रब्दुल्ला के बेटे भौर पपन्लाह के रदूल मोरम्मद की मुख्लमानों गप्रीर उन तव लोगीं के नाम, चाटटे वे जिस | जो एक साथ नसल्र्र रएन दो तस्यार ए६। '*छद
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“उम्मतः (क्रोम) होंगे ***- - नकिसी (बाइर वाले) की सुलह होगी तो सबसे और लड़ाई दोगी तो सबसे | इनमें से किसी के यह हक़ न होगा कि वह सिफ़ अपने मज़हब वालों के दुश्मनों से अलग सुलह करते या उनके साथ अलग लड़ाई छेड़ दे ।*"“-“औफ़, नज्जार, हारिस, जश्म, सालवाह, ओस क़वीलों की अलग अलग शाशझ्ों के यहूदी और सब लोग जो मदीने में आकर वस गए हैं, मुसलमानों के
साथ मिलकर एक 'मुत्तहिदा उम्मत? (मिली हुईं क्रोम) समझे जावेँंगे। : वे अपने अपने धर्मों का उतनी दी आज़ादी के साथ पालन कर सकेंगे !
/जितनी आज़ादी के साथ मुसलमान अपने धमम का |**“ * "जो जमे करेगा उसे सज़ा दी जावेगी***-*“मुसलमानों का धर्म (क़र्ज़) होगा कि वह दर ऐसे आदमी से अ्रलग रहें जो काई जुम करे या किसी के सतावे या किसी पर जुल्म करे। केाई किसी जुमे करने वाले की तरफ़दारी न करेगा चाहे वह जुर्म करने वाला उसका कितना दी पास का रिश्तेदार क्यों न हो |* *“* जो लोग इस ऐलान के मान लेंगे उनमें आपस में अगर कभी केाई कगड़ा होगा तो वद अल्लाह के नाम पर मोहम्मद के सामने लाया जावे. |”
सदीने के सब लोगों ने इस ऐलान को बड़ी खुशी के साथ समान लिया।
सदीने के वाहर भी चारों तरफ़ वहुत से ईसाई, यहूदी और दूसरे क़बीले थे जिनके साथ अपना वर्ताव तय करना जुरूरीं था। प्रेम ओर शान्ति के साथ उनके कानों तक नए धर्म का संदेसा पहुँचाना भी जरूरी था| इनमें से जिन लोगों ने मदीने
भछ क्मन हा अण कक ५ >पसओ नये 52७४-०० ३ कक कक कद भार रमन ०9००
मदीने में राजा की इठिग्त से ८
वालों के साथ सिलकर एक क्रीम ओर एक राज होकर रहना पसन्द किया उनको खशी से अपना लिया गया, ओर उिन््होंने चाहा उनके साथ सुलह की शत तय हो यईह। इन दिना सिनाट पहाड़ के ऊपर सेण्ट कैथराइन के इसाई सठ के महन्तो कौर
अरब के और सव इसाइयों के लिये मोहन्मद साहब ऋऊा जो ऐलान निकला वह बहुत ही मारके का धथा। ऊपर आ चुका हैं कि उस जमाने के इसाई मूर्तियां पूजते थे और उनऊे गिरे मूर्तियों से भरे रहने थे। ऐलान के छुछ हिस्से ये हैं--
“अल्लाह के नाम पर जो सबके ऊपर दया वरने वाला प्रौर है! अल्लाह के रसूल मोहम्मद की तरफ़ से सिनाई पदाड़ » मदन झौर झाम तौर पर सब ईसाइयों के लिये |
“उचमुच अल्लाह सबसे बड़ा, उदसे महान ऐ, तमाम पेश्नम्दर उर्सी के पास से आए, और कहीं नहीं लिखा है कि अ्ज्लाद ने शिनी साथ बेइन्साफ़ी की हो-*-“**
भरे घमम के मानने वालों में से घाटे णाई्र दादशाद दा
भी हो, जो केाई भेरे इस दादे और इस सौगन्ध खत जो ऐलान सदज् तोड़ने फी द्विम्मत करेगा रा, वर ह5्लाट छझछ दचनस णा छे् तोड़ने, तौगन्ध के कुठलाने और (ईश्वर न करे ) ऋएणने ईमान थे तोड़ने का पाप करेगा।
“जब कभी केई ईसाई मदहन्त यादा जरते हुए (मंदीने जे राज के अन्दर) किसी पदाए या पदागी, गाव दा दल में रेगिस्तान में, या किसी मठ, गिरजे या दूहरे एक्दनइगने
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बट इज़रत मोहम्मद् ओर इसलाम
ठहरेगा तो उमकना चाहिये कि उसके जान माल का जी जान से बन्दोवस्त और उनकी हिफ़ाज़त करने के लिये में खुद धम के सच मानने वालों समेत उसके साथ हूं, क्योंकि ये लोग हमारी ही उम्मत (क्लोम) का हिस्सा हैं ओर उनसे हमारी इज़्ज़त है।
“में इस ऐलान के ज़रिये अपने सब अफ़सरों के हुकुम देता हूं कि वे इन लोगों से किसी तरद्द का टैक्स या और केई चुड़ी वगेरह न मार्ग, उन्हें किसी ऐसी वात के लिये सताना नहीं चाहिये ।
“किसी दूसरे के उनके क़ाज़ियों (जजों) या सरदारों के बदलने का हक़ न होगा, और न केई उन्हें इन जगहों से इटठा सकेगा ।
“सड़क पर चलते हुए काई उन्हें किसी तरद्द का दुःख न देगा [”
“किसी के उनसे उनके गिरजे छीनने का हक़ न होगा |
“ओर न उनके जजों, सरदारों, मइन्तों, नोकरों, चेलों या उनके किसी भी आदमी से किसी तरद्द का टैक्स लिया जायगा, न उन्हें ओर किसी तरह दिक किया जायगा, क्योंकि मेरे इस वादे ओर ऐलान में वद ओर उनके सब आदमी शामिल हैं |”
“जो ईसाई मामूली घरवारी हैं और अपने माल और रोज़गार में से टैक्स दे सकते हैं, उनसे भी जितना ठीक द्ोगा उससे ज़्यादह हरगित्ञ न लिया जायगा |
“इंश्वर का साफ़ हुकुम है कि इसके सिवा उनसे ओर कुछ न लिया जायगा |
“अगर काई ईसाई औरत किसी मुसलमान के साथ शादी कर ले, तो वह मुसलमान उसके रास्ते में कोई रुकावट न डालेगा, न उसे
मदौने में राजा की देसिय्त से प्प्रु
गिरजा जाने से रोकेगा, न दुआ करने से ओर न किसी तरद अपने घमम पर चलने से |
[ किसी भी यहूदी या इसाई मां के मुसलमान बेटे का धरे (कर्ज) है कि मां को टट्टू बगेरह पर चैठाकर उसके गिरजा के दरवाज़े तक पहुंचा दे, और अगर वह इतना ग़रीव हो कि ट्ट्ट का इन्तजास न कर सके, या अगर मां इतनी बूढ़ी ओर कमज़ोर हो कि सवारी पर न बैठ सके तो मुसलमान चेटे का धर्म है कि सां को अपने कन््धो पर वैठाकर उसके पूजाघर तक पहुँचा दे ।)
“अपने गिरजों की मरम्मत करने में केई उन्हें न रोक रुफ़ेगा, श्र शअ्रगर ईसाइयों के श्रपने गिरजों या मठों की मरम्मत जे लिये या श्रपने घमें की किसी दूसरी बात के लिये मदद की जरूरत हो तो मुसलमानों का धर्म है कि उनको मदद दें |
“उनके खिलाफ कोई दृथियार न उठावेगा, दा उनकी टिप्राजत के लिये दृथियार उठाना मुसलमानों वा धम द्ोगा | पह्गर देश फे दाएर की किसी ईसाई ताक़त के साथ मुठलमानों की कमी लगाए दो, तो देश के अन्दर के किसी ईसाई फे राथ उसके ईसाई होने फी बजट ने बेइज्जती का सलूक न किया जायगा |
“एस ऐलान से में हुकुम देता हूं कि जब तक दुनिया रऐ ठय मेरे घममे का कोई मानने वाला मेरे हस हुकुम फे प्िलाझ चलने था
ब्ज्लश्छाशडा च्त्गा
मल करने की दिम्मत न क्रे। जो झुसटमान इसके उुैपलाज चलेगा
९० हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
वह ईश्वर और उसके रसूल से बागी ओर अपने धमे से 'मुरतदः (फिरा हुआ) समझा जायगा [*ै?
इस ऐलान को हजरत अली ने अपने हाथ से लिखा, बतौर गवाहों के मोहस्मद साहव के सोलह साथियों ने इस पर दस्तखत किये, ओर तारीख ३ मोहरंस, सन् २ हिजरी को मोहस्मद साहव ने मसजिद में बैठकर अपने हाथ से उस पर अपनी सोहर लगाई ।
सदीने ओर आसपास के बढ़ते हुए देश के हाकिम या राजा की हैसियत से मोहम्मद साहव ने अलग अलग सजहदवों के लोगों के साथ कभी किसी तरह का भेदभाव (फरक्) नहीं किया, सबको अपने अपने मजहवों पर चलने की पूरी आजादी दी और मजहवी फरक्त के रहते हमेशा सबको “एक उस्मत” यानी एक क्रीम या एक राष्ट्र या एक नेशन कहकर वयान किया ।
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इसलाम फ्ेलाने का तरीका
ब्दै2«4:ई-
मदीने में पहुंच कर पहली वार मोहम्मद साहच को खले तौर पर, पूरी शान्ति और आजादी के साथ, अपने विचारों को फैलाने का मौक़ा मिला। अब चह रोज घड़े जोश के साथ उपदेश देने लगे । हजारो आदमी उनका पयानम (संदेसा) सुनने के लिए जमा होते थे । उनके इस काम में किसी के साथ उ्धिस तरह के भी जोर जबरदस्ती की कोइ जगह न थी। मर्दीन जिन दिनो उनकी ताक़त अपने पूरे ज़ोर पर थी उन दिने कुरान मे एक साफ आयत्त हैं--
८४ ता इकराह फ़िद्दीन
यानी--“धमम के मामले में किसी तरह की जबरदसी नहीं होनी चाहिये ४” (२-२५६)
कुरान मे शुरू से आखीर तक जगह जगह दृस तर जी आयतें मौजूद हैं लिनमें यह बनाया गया है. जि अपने धम को लोगो मे किस तरह फेलाया जाय। इनमे शुरू कभी झा आते ये हैं--
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९२ हज़रत मोहम्मद और इस्लाम
“लोगों को अपने रव्व (पालनहार) के रास्ते पर आने के लिए बुलाओ तो होशियारी के साथ ओर बड़े अच्छे शब्दों में समकाओ | उनसे वहस करो तो अच्छे से अच्छे ओर मीठे लफ़ज़ों में करो |? (१६-१२५)
“और जो कुछ वह कहें उसे सन्न के साथ सुनों ओर वरदाश्त करो और जब उनसे अलहदा दो तो बड़े प्रेम ओर खूबी के साथ अलहदा हो |? (७३-१०)
“जिन लोगों ने तुम्हारे धम को मान लिया है उनसे कद्ददों कि वे उन लोगों पर जो ठ॒म्हारी वात नहीं मानते ओर जिन्हें ईश्वर से अपने कामों के फल मिलने का डर नहीं है किसी तरद्द का गुस्सा न कर | जो कोई नेकी करेगा अपनी ही आत्मा के लिए ओर जो कोई बुराई करेगा अपनी ही आत्मा के लिए, फिर सबको उसी रच्च के पास लोटकर जाना है |” (४४-१४, १५)
“पुम्दारा काम, या किसी रसूल का काम, इससे ज़्यादद और कुछ नहीं कि साफ़ साफ़ शब्दों में अपनी वात कद्द दो। फिर श्रगर वे पीठ मोड़कर चल दें तो चलदें, तुम्दारा काम सिर्फ़ अपनी बात समझा देना ही तो था ।? ( १६-३५४,८२ )
“जिन लोगों के पास दूसरी धर्म की कितावे' हैं उनके खाथ बहस न करो और अगर करो तो वहुत दी मीठे शब्दों में करो, फिर जो जबरदस्ती करे ओर न माने वह न माने, उनसे कद्दों कि हम उस किताव को भी मानते हैं जो ईश्वर ने दमें दी है और उसे भी मानते
नर
इसलाम फैलाने का तरीका है
हैं जो ईश्वर ने त॒म्हें दी है, हमारा ओर त॒म्दारा श्रन्लाह एक दी है, ओर उसी एक अल्लाइ के सामने हम सर भुज़तते हैं।? (२९, ४६)
“ एइन्द्दी विचारों की तरफ़ लोगों का ध्यान दिलाते रहो ध्रौर लिस तरह तुम्हें हुकुम दिया गया है उसी तरह ठीक ठीक खुद अपनी ज़िन्दगी वसर करो, दूसरों के वहमों में मत आओ, और कद्द दो क्रि मे अ्ल्लाद को सब किताबों को मानता हूं, मुझे इन्साझ वा हुहुस है, अल्लाद दमारा श्रोर तुम्हारा सबका रव्ब हैं। जो ठुम ऋरोगे उसका तुम्हें फल मिलेगा और जो में करूंगा उसका शुके फल मिलेगा. इमारे बीच में कोई झगड़ा नहीं है, श्रह्माद दम उवझे मिला देगा, दम सबके उसी के पास लौटकर जाना है |?” (४२-१४)
“फेर भी वे ठुम्द्ारी न सुनें और मुट मोर लें, दो दुम उनेे केई निगहवान वनाकर नहीं भेजे गए दो, ठुम्दारा काम सिए दमभा देना है ।! (४२-४८)
“श्रगर तुम्दारा रब्व चाहता तो उचरुंच दुनिया वे मद लोग एश ग़याल के द्वो जाते, दो क्या तुम क्ठी के छाथ एुबरदस्ती बरोगेएदि सब तुम्दारी ही बात मान ले ” (१०-९९)
कण शक मजा ६ वि रद धखरादाभ्या 7 कट
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“झौर हमने तुम्तें सिए शसा नेक कामों के बदले में अच्छे छल की चर इने फामों णे बदले मे बुरे फल की दात दताओं |” (३४-२८)
झपर की सच आयतले सब ऊऋा € जप मरम्भद सार माणए
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५४ हज़रत मोहम्मद और इसलाम
नीचे लिखी आयतें उस जमाने की हैं जब मुहम्मद साहव मदीने में थे, ये और भी ज्यादा साफ हैं--
“धर्म के मामले में किसी तरह की भी ज़बरदस्ती नहीं होनी चाहिए |?! (२-२५६)
“ग्रज्लाह ओर उसके रसूल का कहना मानो । न मानो तो तुम्हारी मरज़ी, रसूल का काम साफ़ साफ़ कह देना भर है ।” (६४-१२)
“बह ठुमसे हुज्जत करें तो उनसे कद्द दो कि मेंने अपने आपके बिलकुल अल्लाह की मरज़ी पर छोड़ दिया है। यही इसलाम शब्द के माइने हैँ | जिन्होंने मेरी वात मान ली उन सब ने भी अपने के उसी इंश्वर की मरज़ी पर छोड़ दिया है। जिन लोगों के पास दूसरी धर्म की किताबें हैँ या जिनके पास नहीं हैँ उन सबसे कद्दों कि ठुम भी अपने के एक ईश्वर की मरज़ी पर छोड़ दो | वे मान जाये तो अच्छा करेंगे | न मानें तो ठम्हारा काम कद्द देना ही है, अल्लाह अपने सब बन्दों को देखता दे |? (३-१९)
“तुम में इस तरद्द के आदमी द्ोने चाहिये जो लोगों के सबके साथ नेकी करने का उपदेश दें, सबको नेक कामों में लगाएं ओर बुरे कामों से बचाएं, ऐसे लोगों का ही भला होगा ।” (३-१०३)
“हमने हर क़ोम के लिए पूजा के अलग अलग तरीके ठहरा दिये हैँ, जिन पर वह चलते हैं, इसलिए. इस बात पर नहीं झगड़ना चाहिए। तुम्हें उन्हे सिर्फ़ ईश्वर की तरफ़ बुलाना चाहिए, सचमुच ठुम सीधे रास्ते पर हो, और जो वे तुमसे ऋगड़ा करें तो कद्द दो अल्लाइ उब जानता दे कि ठुम क्या करते दो [” (२२-६७, ६८)
इसलाम फेलाने का तरीका ध्प्
“और जो गेर-मुसलमानों में से कोई तुम्हारी पनाद में श्राना चाहे, तो उसे अपने पास बुला लो, जिससे वह नुम्दारे पाठ रद दर अल्लाइ का कलाम यानी अल्लाइ की बताई बातें सुने, और जो इठ पर भी वह तुम्हारी बात न माने तो उसे दोशियारो से उसके घर तक या किसी हिफाज़त की जगह तक पहुंचा दो, क्योंकि वे लोग प्रनजान
[? (९-६)
एक वार किसी अरव ने जो पुराने धम का मानने वाला था हज़रत अली स पूछा कि अगर हम इसलाम धम के बार में या किसी ओर वात के बारे भे कुछ जानने के लिये पैराम्वर के पास जाना चाहें तो हमें कुछ डर तो नहीं हैं ? हज़रन अली ने इसी ऊपर की आयत फो नकल करते हुए जवाब दिया फि किसी को कोई डर नहीं हैँ | ( इवने अच्चास )
धभुम्हें उनमें इस तरह के आदमी मिलते रहेंगे जो एक दार दात मान कर उससे फिर जावे, यानी दग़ा करे, उन्हें माण दर देना पीर छोड़ देना, सचमुच अललाद उन लोगों को प्यार वरता हे जो दूगरो पर अदसान करते हूँ |”? ( ५-१३ )
मुहस्मद साहब का अपने घर्म को फलाने झा नरोश ज़िन्दगी भर ऐसा ही रहा जैसा फरान छी इन आयतों में दताया गया है। उनकी सारी ज़िन्दगी में एक भी मिसाल ऐसी नाते मिलती जिसमे उन्हों ने किसी णो भी तलचार फे फोर स या किसी तरह का दवाव डाल ऊर घपने धन में शामिल ज्या हो, और न उनन््दों ने किसी झबीले था गिरोद पो फ्पने धस मे
९६ हज़रत मोहम्मद ओर इसलाम
लाने के लिए कभी किसी पर भी चढ़ाई की या एक भी लड़ाई इस काम के लिए लड़ी ## वह धम में दूसरों को उतनी ही आज़ादी देते थे जितनी वह दूसरों से अपने लिए चाहते थे ।
सदीने में पहुँचने के बाद मुहम्मद साहव ने अपने धम का फेलाने के लिए मदीने से बाहर के दूर दूर के क़वीलों में समम- दार आदमी भेजने शुरू किये। आस तोर पर जिस दिन उन्हें किसी ऐसे आदमी को कहीं भेजना होता था वह उसे बहुत सवेरे अपने पास घुलाते थे। सुबह की नमाज़ के वाद, फिर से इंश्वर की तारीफ़ कर और दुआ सांग कर वे उस आदमी को थों समझाते थे--
“ग्रटलाह के बन्दों के साथ मिलने जुलने में अल्लाह के हुकुम को न तोड़ना । आदमियों का कोई काम जिस क्रिसी को सॉपा जाता है, वह अगर सचाई से लोगों की सेवा नहीं करता तो अल्लाह उसके लिये जन्नत ( स्वर्ग ) का दरवाज़ा बन्द कर देता है।
“लोगों के साथ नरमी से वत्ताव करना, किसी से सख़ती न बर- तना | उनके दिलों को खुश रखना। उन्हें बुरा न कहना | जब वे तुमसे पूछें--“स्वर्ग की कुंजी क्या है? तो तुम जवाब देना--एक ईश्वर की सचांई और नेकी में विश्वास करना और नेक काम करना
“तफ़्सीरुल कुरान, लेखक सेय्यद अहमद खाँ, जिल्द ४; ४6 ?&णांप्ररु ण ॥929, 07 ४ एफ. 870०0, ८0 ॥| , 7 33, ॥॥6 छल0०ए (2०7 7ए (०४घा्घ75906 67, ४ 97
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मदीने पर क़्रेश के हमले
मुहम्मद साहव का धम मानने वालों की तादाद अब ज़ोरों के साथ बढ़ने लगी । इसके साथ साथ मदीने का राज और मदीने का वड़प्पन भी वढ़ रहा था। अरव के अन्दर मक्के से सिफ़ २८६ मील दूर एक और वरावर के राज का क़ायम होना और बढ़ते जाना क़ुरैश कब सह सकते थे | मक्के ओर वहां के मन्दिर काबे दोनों का पुराना वड़प्पन भी अब घटने लगा। क्रैश जानते थे कि अगर मुहम्मद की ताक़त को बढ़ने दिया गया तो एक न एक दिन मक्के का पुराना धर्म ओर मकक््के का वड़प्पन मिट जायगा |
क़रेश इसका इलाज सोचने लगे। उन्हों ने मुहम्मद ओर मदीने का ताक्तत को कुचल देने का फ़ेसला किया। जो थोड़े मुसलमान मकक्के में रह गए थे उन्हें वे वरावर तकलीक़े देते रहे। धावे मार मार कर उन््हों ने मदीने वालों के शहर से वाहर चरते हुए ऊंटों और घोड़ों को उड़ा ले जाना शुरू किया | मदीने वालों की तरफ़ से झुरू में इसका कोई जवाव नहीं दिया गया।
अुनिकिए
मदीने पर करश » रमले ९
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भसदीने मे मुहम्मद साहब को आए जब दो साल हो गए नो पता चला कि १००० करंश ७उ०० ऊंटों और १०० धोहीो समन मदीने पर हमला करने आ रहे हँ। महन्मद साहव की उम्र ४४ साल की थी। अपने उस घस छा उपदेश देने, जिस दद
दुनिया के लिए इंश्वर का संदेसा मानते थे, उन्हें १ चुके थे। इन १५ साल के अन्दर वल्कि ५४ साल के अपने सारे जीवन मे, सिवाय एक मौफ के जब कि लड़कपन में हरव फिज्ञार! के अन्दर ( एक लड़ाइ जिसका पहले क़िक्र आ उक्ा हैं ) वह अपन चचा को तीर उठा उठा कर दे रद्द थे, प्राज्न नफऊ उन्हा ने कभी किसी लड्डाई सें किसी नरह छा भी रटिल्लान लिया था। लेकिन आज शहर भर के लोगों की जान माल को दिफाज़त का घोक उनके कन्धो पर था। जैसी इनफी फादन थी, राज़ ( उपदास ) और नमाज़ ( साथना ) के जग्यि घन्या न्णे ने अपने रबच्च स हिदायत मांगी। फ़रान में पहली बार लगाः की इजाजत की आवचने इस तरह उइतर[--
“जिनसे ओर लोग ल/्ने के लिये आते हैं उन्हें भी नटने की इजाज़त दी जाती है क्यों कि उन पर यद जुल्म है। सचमुच एस्टाए में उन लोगों की मदद करने को ताइन ₹ छिन्टें नए घट बहने जुर्म में कि--एक अस्लाष पी हमारा रस ९ -देहस्लारी घरों से निकाल दिया गया है !
“अगर घल्लाद इस तरर इुहु लोगों ( झादाएदों या द्िना दियों ) को दूसरे लोगों से ने एव्चाठा ते सचमुच डुनिया भें मद, सार-
१०० हज़रत मुहम्मर ओर इसलाम
यहूदियों के मन्दिर और सब दूसरे ( धर्म वालों के ) पूजाघर जिनमें अल्लाह का नाम बार वार लिया जाता है कभी के गिरा दिये गए. होते।? ( कुरान २२-३८ से ४० )
“अल्लाह की राह में उन लोगों से लड़ो जो तुम्दारे साथ लड़े, लेकिन दृद से कभी न बढ़ों, सचमुच अल्लाह दृद से बढ़ने वालों से कभी प्रेम नहीं करता ।
“आर जो वे लड़ना वन्द करदें तो तुम सिवाय उन लोगों के जो जुल्म करते रहें और किसी के साथ दुशमनी जारी न रखो।” (२-१९०, १९३)
मुहम्मद साहव या उनके साथियों की तसल्ली न हुईं। अपने बचाव के नाम पर भी उनका दिल लड़ाई से हटता था। वह सोचते थे कि जो फ्रोज मक्के से आ रही है उसमे बहुत से हमारे नजदीकी रिश्तेदार हो सकते हैं | ये ओर वे सब एक ही दादा की ओलाद थे। ठीक उसी तरह का धम संकट अब मुसलमानों के सामने था; वह उसी तरह की उलमन में पड़े हुए थे जिस तरह की उलमान में कुरुक्षेत्र के मैदान में अजुन। मुहस्मद साहव ने फिर रोज़ा रखा और दुआ मांगी । अपने दिल में बैठे हुए इश्वर से उन्हें हुकुम मिला--
“तुम्हें लड़ने की इजाज़त दी गई है लेकिन तुम्हें उससे नफरत है । हो सकता है कि तुम एक ऐसी चीज़ से नफ़रत करते हों जो ः तम्हारे लिये भलाई की हो, और ठुम्हें ऐसी चीज़ से प्रेम हो जो वुम्दारे लिये बुरी हो । ओर अल्लाद जानता है, ठुम नहीं जानते |? )२-२१६)
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महोने पर क्रैंश क हमले १०१
“क्या ठुम ऐसे लोगों से न लड़ोगे हिन्दोंने पदले इ्रद लाई शुरू की |? (९-१३)
“श्रोर तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्लाह की राह में हमने.
औरतों श्रौर बच्चों की दिफाज़त के लिये भा नहीं लड़ते (० (४-७५) रज सिफ ३१३ आदमियों को साथ लेकर मुहम्मद साहव मस्के ः से आने वाली फौज को रोकने के लिये निकले । फ्रेश मम्के से हे हु आधी दूर आ चुके थे। बद्र! नाम की हरी भरो घादी मे | (६२४ ३४०) दोनों कौजो में खूब घमसान की लड़ाई हुई । मदीने ग् की फीज से धरम और इन्साक के नाम पर लड़ने दालों का जोए था । फ्रेश को मेदान छोड़कर भागना पड़ा। महीने बालो फे
९४ ओर कुरैश के ४६ आदमी भेद्ान में फाम आए। ओर ञ इतने ही क्रेद कर लिये गए | करीब फ़रोच सब देशों में उन दिनो रिवाज था झि जो लोग
्र २ ७... लिये न ३० कर. ना ि लड़ाई मे क्रेंद कर लिये ज्ञाते थे उन्हें या तो मार टाला झा
रु था या गुलाम बनाकर रखा जाता था। पर इस मीझे पर | मुहस्मद साहब के हुकुम से इनमे से बहुत से जो गरीब थे, हस | वादे पर छोड़ दिये गए कि वे फिर कभी सुसलसानों दा मीना वालो के खिलाफ हथियार न उठादेंगे पीर बाजी से ताप हरज़ाना लेकर उन्हें आजाद कर दिया गया। शाप चटियां से जो पढ़े लिखे थे यह काम लिया गया कि उनमें से एरेक दस दस्र गदीने वालों को लिसना पटना सिखा दे शरीर घलाजाय।
ज्तिने हा... के झंण, बे #. के... से च ब्छ दिन तने दिला त्तक ये फटी मदीने मे रहे सलने दिनो धराध्र--
१०२ दज़रत मुहम्मद ओर इसलाम
“मुहम्मद के हुकुम से मदीना वालों ने ओर उन मुहाजिरों ने जिनके पास अपने घर थे क़रेदियों को अपने अपने यहां रखकर उनके साथ बड़ी ही इज्ज़त का बर्ताव किया। बाद में इन क्रैंदियों ने खुद बयान किया दी ना वालों पर अल्लाह की बरकत हो ! वे खुद पैदल चलते थे ओर हमें सवारियों पर बैठाते थे। जब रोटियों की कमी थी वे हमें गेहूँ की रोटी खिलाते थे और आप खजूर खाकर रह जाते थे ए ?*
बद्र की लड़ाई के बाद उमैर इब्न वाहब नामी एक नोजवान मुहम्मद साहब की जान लेने के इरादे से मदीने आया। वह कुछ दिन उनके उपदेशों को सुनने का उस पर इतना असर हुआ कि उसने अपने आप सामने आकर अपने दिल का पाप कह डाला और इसलास घर अपना लिया ।
मुहम्मद साहड ने इसके वाद कोशिश की कि क्रैश के साथ सुलह हो जावे । उन्होंने कहला भेजा--
४ऐ, मक्का वालो ! ठुम फ़ेसला चाहते थे तो वह हो गया, अब अगर तुम मुसलमानों पर हमला न करो तो अच्छा है, लेकिन अगर तुम फिर हमला करोगे तो हमें भी लड़ना पड़ेगा, ओर तुम्हारे साथ कितनी भी फौज द्वो कुछ फ़ायदा न होगा, क्योंकि अल्लाद ईमान वालों
के साथ है।
| [6 06 (००णाार, 779 570 ए श(एंए, ५०, 7, ?, 424&
मंदीने पर क्रेश के हमले श्०
४«-«« अगर वे अब इमला न करे तो अ्रद तकजों इुद्द हो चुका सब माफ़ कर दिया जायगा [” (८-१९, 3८ )
लेकिन इसका कोई नतीजा न हुआ। कुरेश की तरस से धावे जारी रहे।
बद्र की लड़ाई के वाद ही अचु सुफियान २०० तेज घुडसवार लेकर मक्के से निकला ओर मदीने से तीन मील उधर, दो मुसलमानों को सार कर, वहां की खेती को चरबाद कर, रपमृर के दरख्तो को आग लगा, मदीना वालों के निऊुलन से पहल पहले वापस लोट गया।
अगले साल तीन हज़ार आदमी लेकर 'अचु सुग्यिन न फिर सदीने पर हमला किया | इस हमले की गरज़ उन फुरईशों का बदला लेना वताया गया जो पिछले साल बद्र फी लगार में मारे गए थे। फरेश मदीने के पास आ पहुँचे | क्रीय एक हज़ार आदमी लेकर मुहम्मद साहब मदीन से बाहर घाए। झोहए की पहाड़ी पर दोनों दन्तो से सुठभेड़ हह। वहां ज्ञाना मुहम्मद साहव की फ़ोज से सिफ्र दो घुट्सवार थे श्गैर फ्रेश की तरफ दो सो। इस लड़ाई में झथु बह्ल, उमर श्र 'परत्ी तीनों बुरी तरह घायल हुए। खुद मुहस्मद साहब के पहले एए पत्थर से चोट लगी और फिर एक तौर प्यार लगा फ्िसमे उनका ओठ फट गया ओर घझागे का एक दांत दृट गया। फऋरश
का पन्ला भारी रदहां। लेकिन ये इतने धर धारजि आग ने दा.
आस पास लूट मार कर. चहो से ल्ीटद गए।
| १०४ हजरत मुहम्मद और इसलाम
ओहद की लड़ाई में जो मुसलमान क़ुरेश के हाथ पड़ गए थे उन्हें खूब तकलीफ़ें दी गईं, जिनका वयान करना बेकार है। मुसलमानों में बदले की आग भड़की । उस मौक़े पर छुरान में आयत्त उत्तरी-- '
“अगर तुम बदला लो तो जितना नुक़सान तुम्हें पहुंचाया गया है उतना दी बदला लो, लेकिन अगर ठुम सत्र के साथ सहलो तो सचमुच सद्द लेने वालों के लिये सबसे अच्छा है, इसलिये तुम सत्र के साथ सहला |?
लड़ाई के वाद हुशमन के मुरदों और घायलों के नाक कान काट लेने का जंगली रिवाज उन दिज्ञों यहूदियों, इसाइयों और सव लोगों में था। कुरेश ने भी ओहद की लड़ाई के वाद ऐसा ही किया था। मुहम्मद साहव ने अपने आदमियों को ऐसा करने से मना कर दिया ओर धीरे धीरे सुहम्मद साहव ही के हुकुम से यह रिवाज अरब से हमेशा के लिये उठ गया।
क्रेश की दुशमनी अब और ज्यादह पक्की हो गई। उन्होंने सदीने से बाहर के अरब के दूसरे बड़े बड़े क़वीलों को अब मुहम्मद साहव के खिलाफ भड़काना शुरू किया | कई लड़ाइयां हुई । इन सब छोटी मोटी लड़ाइयों को वयान करना वेकार है। जितनी फ़ोजें मदीने से वाहर भेजी जाती थीं उन सबके सरदारों को मुहम्मद साहव की तरफ से ये कड़ी ढिदायतें दी जाती थीं---
5 कुरान १६, १२६-१२८ |
मठौने पर ऋररेश छे; हमले १८५
हि “किसी हाल में भी घोसे या दग़ावाती ने छाम न लेना, गैर ८ कभी किसी वच्चे क्री जान लेना |
“हमें जो जो नुकयान पहंचाए जावें उनझा बढ़ना लेने में वर्भों
भी अपने अपने घरों के अन्दर रहने वाले वेगुनाद लोगों थो दुर्ा न देना | कमी ओ्रौरतों पर दइमला न करना। दुधमुददे दसयों ब्योंः और एन
पर पड़े बीमारों को कमी हाथ न लगाना। बसी झे जो लोग सुमन नहीं लड़ते उनके घरों को कभी न गिराना। लोगों हे रोदी दम्ाने हे ओोज़ारों और फलदार दरझ्सों को वर्बाद न करना | रड़र हे पे को कभी दाथ न लगाना, क्यों कि उनदा साया लोगों हें. लिये सफर है श्रौर उनकी दरियाली लोगों के दिलों को रुश एरती
क़रेश के साथ इसके बाद एक बड़ी लड़ाई मा सन ६-६ इसवी में हुईं जो 'खुन्दक की लड़ाई? ेे नाम से मशरर है। बए लड़ाई इस तरह हुई--
फ्रेश सरदार अबु सुफियान ने, बनी गितझान फऐ्रोर दूसरे क़यीलो को अपनी तरफ मिलाकर, जिनमें जशर यही फरीज भी थे, उस हज़ार हथियार बन्द्र लोगो को लेबर मरीते पर चढ़ाई की । खबर पाते ही मुट्म्मट साएब मे शहर फे पचाद की सोची | उनके एक इरानी साथी सलमान ने राय दी शि शहर की चहार दीवारी के बाहर एक गहरी स्यार रगद दी ज्ञाइ, जिससे दद्ममन परासानी से शु्स पार ने शंसके। शग्म्माः
९ ध्च् पैक 8. ऋष्७ साहब फे हुकुम से राई खुदने लूगी। दूसरे लोगो के साथ ना
* १०६ दज़रत मुहम्मद और इसलाम
मुहम्मद साहब भी फावड़ा ओर टोकरी लेकर मिट्टी ढोने लगे। ओर इस तरह के गीत गा गाकर लोगों की हिम्मत बढ़ाने लगे---
“ऐ, रब्ब ! तेरे विना हमें कोन सच्चा राखा दिखाता !
“न हम खैरात करते होते, और न तेरी बन्दगी करते !
“तू दी हमें शान्ति दे और लड़ाई में हमारे कदमों को मज़बूत कर |
“क्यों कि वे लोग दमारे खिलाफ उठ खड़े हुए हैं, उन्हों ने हमें रुच्चे रास्ते से हटाना चाहा, लेकिन हमने साफ इनकार कर दिया ।”
आखरी टुकड़े को मुहम्मद साहव ज्यादह ज़ोर से गाते थे।
«5 खाई अभी पूरी भी न हुई थी कि दुशमन आ हृटा। दस
हज़ार फ्रोज खाई के उस पार ओर तीन हज़ार इस पार । वीस दिन तक दोनों तरफ़ से पत्थरों और तीरों की वोछार होती रही | वीस दिन वाद किसी एक जगह जहां खाई कम चोड़ी रह गई थी दुशमन की छुछ फ्रोज इस पार आ गई। खूब घमसान हुआ | काफ़ी नुकसान उठाकर दुशमन को फिर खाई के पार चला जाना पड़ा | सरदी, मेह ओर रसद की कमी से भी क़रेश को काफ़ी चुक़सान हुआ। आखिर पस्त ओर लाचार होकर बचे हुए करेश मक्के की तरफ़ और दूसरे क़वीले वाले अपने अपने घरों को लौट गए । क्ुरेश का मदीने पर यह आखरी हमला था ।
इसलाम के कुछ उपदेश देने वाले
थी कक लक “३००३ * «लंबा
करश के खिलाक इस जीत से मदीन की नह वपेसी सारण आर मुहम्सद साहव दाना का असर बढ़ता चला गया। सलाम के फलसल से भी इस से चहुत मदद मिली। सदीन में सग्स्मप साहब ख़ुद उपदेश देव थे, और मदीन से घाहर के किए दम
दिनो एक झ्राम रिवाज यह था फि दूर दूर के झबीसलोी # बे चड़े आदमी या मुखिया महग्सद साहब से मिलन मदीने ते थ्रे । इन में से कई मुसलमान होकर लौटते थे। फिर इसी जय
या कृभी कभी इनके साथ इछ्ध घोर ऊा भी पतन शवीना मे उपलशा के लिए भेज दिया ज्ञाता था ।
इन अलग घलग क्बीलोी के जो लोग झास्मद सगापरसे मिलने आते थे उनके साथ सतम्मदर साय शा सरझ सतना अच्छा झोर प्रेम का होता घा. उनको शिशायतों पी नशस दा
आर तक
उतनी अच्छी तरह ध्यान देन थे दौर इहम पापली भगाए जा
श्ण्प हजरत मुहम्मद और इसलाम
साहब का नाम होता था और इसलाम से लोगों का ग्रेम बढ़ता था ।* अलग अलग क़वीलों में इसलाम केसे फैला और कहीं कहीं केसी दिद्नक्॒तें हुई इसकी कुछ मिसालें नीचे दी जाती हैं-- (१) सन् ४ हिजरी ( ६२५ ३० ) में नज्द इलाफ़े के बनु आमिर क़वीले के सरदार के कहने पर चालीस मुसलमान सदीने से वनु आमिर क़वीले में इसलाम फेलाने के लिए भेजे गए। इन चालीस सें से ३८ वहां दग़ा देकर मार डाले गए। दो जिन्दा वापिस मदीने पहुंचे । | (२) सन् ५ हिजरी में ज़िसाम नामी एक वदू सरदार अचानक मुहम्मद साहव के पास पहुँचा। उसने उनसे इसलाम के बारे में वहुत से सवाल पूछे । आखीर में चह मुसलमान होकर लौटा और उससे अपने क़वीले वालों में इसलाम को फेलाया । (३ ) मदीना और लाल समुद्र के वीच में वन्रु जुहैनाह नाम का एक क़वीला रहता था | उसका एक खास मन्दिर था। सन्दिर में पत्थर को सूर्तियां थीं। अम्र वहां का पुजारी था। उस मुहम्मद साहव से आकर मिलने की सूकी । मुहम्मद साहव मक्के में थे | अम्र पढ़ा लिखा ओर शायर था। वह मसक्के आया । मुहम्मद साहब से चातचीत के वाद उसने नए धर्म को अपना लिया । अपने क़चीले में जाकर मुहम्मद साहब के हुकुम से उसने नए धर्म का उपदेश देना झुरू कर दिया। उसका असर इतना
पा, (2) ए० 3४. 77, 07-8 ,
इसलाम के कुछ उपदेश देने वाले १००
अच्छा पड़ा कि थोड़े ही दिनो में चहां सिफ एक आदमसी रह गया जिसने उसकी वात न सानी ओर जो अपने पुराने विचारों पर अड़ा रहा। वाफ़ी सव लोग मुसलमान हो गये (इच्न साद, १६१८)। (४) सन् ६ हिजरी में मुहम्मद साहव की मकक्के वालो से सुलह हो गई । इस सुलह का ज़िक्र आगे चलकर किया जावेगा। यहां पर यह बता देना ज़रूरी हैँ क्रि उस सुलह से इसलाम के फेलने मे ओर भी मदद मिली। मक््के के बहुत से लोग जो कुछ साल पहले अपने शहर मे मुहम्मद साहब के उपदेश सुन चुके थे, ओर जो क्रैश के डर से रुके हुए थे. उस सुलह फ्र बाद मदीने पहुँच कर नया घम प्रपनाने लूगे । खास कर मच्के से दक्खिन ऊे उलाकों मे टसन््गम फेलने के लिये तभी से रास्ता खुल गया | (५) यमन के उत्तर की पहाड़ियों में धनु दास छथीला रटनता था। इस कबील के कुछ लोग मुदस्मद साहब के पाले से कवि किसी नये ओर ज़्यादह ऊँचे धर्म की पोज मेंथ।! इहस्मा: साहव के उपदेशों की खबर सुनकर दौस फदील झा सगगर तरेल मुटम्मद साहव से मिलने मक्के माया। बट शार # था। उसने अपनी ऊूछ शायरी शुएन्मद साहब रो सूनार। झुहम्मद साहब ने उसे ऊरान के इद सूरे सनार। दुधन हे नया धर्म पसन्द जाया। वह सुसलमभास ही रंया। शग्मग्मद
] च्द च्क कक हा स्क डे च 777 6 कप आर साहच विकार । स्ज्ञाजनन बा अल] क्या म्पूकनदूबममभगकुक.. कुष्पामइन्याध्यकमम्पक.. निधन "यकण-बहुड.. छायुकरनगक रद 4 ००क-कुन ऋजइुाावारकरक वे की इजाजत ले इसने जपतसे उ्छि ण कलागा से सापररर
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सुर्च्ाने ४ ध पालाना द््क्् स्ककमपकण ः मय (० मम के 548 200 ही: शी. इसलाम को फोलाना शुरू किया। लेशिन सिद्यार इस्ताश बाय
११० इदज़रत मुहम्मद और इसलाम
उसकी बीवी, ओर कुछ दोस्तों के किसी ने उसकी न मानी । तुफेल मुहम्मद साहब के पास आया। मुहम्मद साहब ने उसे सत्र, धीरज ओर प्रेम से काम लेने और अपना काम जारी रखने की सलाह दी | वह फिर लौटा । इस वार एक ओऔर साथी ने उसे मदद दी । ये लोग घर घर जाते थे ओर नए धर्म के असूल समझाते थे। इस तरह धीरे धीरे उस क़बीले के थोड़े ' थोड़े लोग इसलाम धर्म अपनाते जा रहे थे। तुफ़ेल और उसके साथियों ने अपना काम जारी रक्खा । आखिर सन् ८ हिजरी तक यानी क़रीब क़रीव दस वरस के अन्दर उस क़बीले के सारे लोगों ने नये धम को अपना लिया। ये लोग मुसलमान होने से पहले लकड़ी के एक लट्ट॑ को अपने क्वीले का देवता मानकर उसी की पूजा किया करते थे। अब वे सब एक निराकार इश्वर की पूजा करने लगे, जो सारी दुनिया का मालिक है। जब क़वीले भर में कोई आदसी भी उस लकड़ी के देवता का पूजने वाला न रहा तो क़वीले के सरदार तुफ़ेल ने उसे सबके सामने लाकर उसमें आग लगा दी ।
इसी अरसे के अन्दर इसी तरह १५ ओर क्रवीलों ने इसलाम को अपनाया |
(६) तायफ्र शहर का एक सरदार उरवाह मुहम्मद साहव से मिलने सदीने आया। उसने इसलाम धर्म अपना लिया। चह बहुत जोशीला था। उसने मुहम्मद साहब से इजाजत चाही कि में अपने शहर जाकर इसलाम को फेलाऊं। मुहम्मद
इसलाम छे कुछ उपदेश देने वाले ११
शक
साहब ने पहले मना फिया। फिर उसके जिद करने पर इजाजत दे दी | वह त्तायम गया। तायफ् पुराने विचारों का खास गद था। उसने खुले तौर मूर्ति पूजा की घुराइयां की । एक दिन जद वह खड़ा उपदेश दे रहा था एक तीर उसे आकर लगा | उरवाद ने इश्वर को सराहा और वह वही शहीद हो गया |
(७) मुहम्मद साहव ने यमन के तीन बड़े बढ़े फ्वीलों छे सरदारो के नाम एक खत लिखा। इस खत में उन्होंने घहे अच्छे और भेम के शब्दों में उन्हें इसनाम अपनाने की कहा | यह खत मुहम्मद साहब ने झ्रयाश नासी एफ आदमी के शाथ भेजा | अयाश जब मदीने से चलन लगा तो सशस्मद सार ने उस यो सममकाया--
“जब तुम उनके शहर तक पहुँच माओ हो राद णे शएर ऐ अन्दर मत जाना | छुबद तक वादर ही ठटरना | पिर सुदर शा प्रच्दाों तरह नहाना, और 'दो रकग्त्तः नमाज़ पढ़ना, तीर प्काद ने हुच्प
मागना कि तुम्हारी मुराद पूरी हो, लोग नुम्में: मुरब्दत से मिले, कमर तुम एर तरह को धराफ़त से बचे रहो। शिर मेरा एस 'चापने दापिदे
हाथ में लेना । अपने दाएिने दाथ से उसे उने दाहिने हाथी में पेन । वे उसे ले लेंगे । फिर उन्हें उरान गा (८ था शुरा शाहर शुनाना। जब सुना चुके। तो कहना--हिदृम्भद से इरा पर पिद्याह रिण है रची अपने कबोले के लोगों में से हूदसे पहिते अ#ंगे दिश्णशा बिग है इसके दाद तुम उनझे हर रुपाल पा ज्याद ।
कि.
वह छुग्दारे ज़िलाण फरटेंगे उनरी रात णीदी पढे शाण्गा, शो थे दिएा
श्श्र् हज़रत मुहम्मद और इसलाम
विदेशी बोली में वात करे या विदेशी वोली में केाई हवाला दे, तो कहना इसका तरजुमा कर दो। ओर उनसे कहना - 'ेरे लिये एक अल्लाह वस है। में अल्लाह की किताव में विश्वास करता हूं। मुमे इन्साफ़ करने का हुकुम दिया गया है। अल्लाह हमारा और तुम्हारा सब का मालिक है | हमें अपने कामों का फल मिलेगा और तुम्हें ठम्हारे कामों का फल मिलेगा । इममें ओर ठुममें कोई भगड़ा नहीं है। अल्लाद हम सबके मिला देगा। दम सबके उसी के पास जाना है [? इसके बाद अगर वें सव के सब इसलाम अपना लें, तो उनसे वे तीन छुड़िये मागना जिनके सामने वे जमा द्ोकर दुआएं मांगते हैं। इनमें से. एक छुड्टी सफ़ेद और पीले धब्बों वाली भाऊ की है, दूसरी वेत की तरह गठीली हैं और तीसरी आबनूस की तरह काली दे। इन छुड़ियों के बाज़ार में लाकर सबके सामने जला देना ।” अयाश लिखता है---
“मैं गया | मैंने ऐसा द्वी किया | जब में वहां पहुँचा तो मेने देखा कि सब लोग किसी त्योहार के लिये अच्छे अच्छे कपड़े पहने हुए थे | में उनसे मिलने के लिये वढ़ा | आख़िर में तीन दरवाज़ों पर पहुँचा, लिनके सामने तीन बड़े बड़े परदे पड़े ये; में बीच के दरवाज़े का परदा उठाकर अन्दर गया | मैंने देखा लोग उस मकान के सहन में जमा थे। मैंने उनसे जाकर कहा कि में अल्लाह के पैग़म्बर का संदेसा लाया हूं | इसके वाद मुझे जिस तरह कहा गया था मेने वेसा ही किया | उन लोगों ने मेरी वात्तों को ध्यान से सना। ओर ओआम्ीर में जैसा पैग़म्बर ने कद्ा था वेंसा दी हुआ |”? (इब्नसाद, ५६)
न्चै्जे
इसलाम के कुछ उपदेश देने बाते ११
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छ़ियों के जलाने की इजाजत सिक्र उस सूरत में दी गई थी, जबकि उस क्रबीले में एक भी आदमी उनका पूजन दाला रहे । इस मामले में टीक यही वर्ताव मुहन्भद साहब और उनझे साथियों का और सव जगह होता था।
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कुरान के जिस ६८वें सूरे का ऊपर जिकः है उसशी खास आयत यह है---
“५उनको सिवाय इसके और कुछ हकुम नदी दिया गया कि ने सचाई के साथ एक इंश्वर की पूजा करें, उसी झा हुकुम साननें. सच्चे और ईमानदार रहे, एश्वर से दुआ मांगते रहे, पैर
गरीबों टैते ५० हक] री हुं औ ७३ गरीबों को दान देते रहे, यही सघा और पा धम हैं ।" (६८-५)
(८) यमन में सबसे वड़ा कब्रीला एमद्ान नाम छा था।
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कवीले जैक कक... के... २७ न 'इस कवीले के लोगो मे जब इस नए मजहब फी दापरे पहुयी,
तो उन्होंन अपने आमिर नामी एक आादनी पी मदझे भेजा। आमिर मक्के में मुहम्मद साहब से मिला "गैर मुसलमान होकर अपने घर लौटा। मदीने पहुँचने फे हुए दिनो पाए मुहम्मद साहब ने सालिद फो उस णबीले में सलाम एफ उपदेश देने के लिये भेजा। न्यहलिंद हाप् उयागा ने जग साशा | वह छै नहीने वाद मदीने लोद प्राया। इसे दाद झटस्गर साहव ने खालिद की जयद अली जो दहां भेता। घोर परिर कुछ घरस के प्रनर एमदान पीते पे झा मग सुसानमान दो गए। (दुसारी) ष्द
११४ हज़रत मुद्ृम्मदर और इसलाम
(६) यमन ही में इंरान के भी कुछ लोग आवाद थे। सन् १० हिज़री में मुहम्मद साहब ने वरवचन यखनस नामी एक आदसी को उनसें उपदेश देने के लिए भेजा ।
(१०) इसके वाद मुहम्मद साहब ने मुआज़ ओर अबू मूसा दे आदमियों को यमन के एक एक ज़िले में जाने ओर उपदेश देने के लिए भेजा, और चलते वक्त उनसे कहा--
“अपना काम नरमी से करना। किसी से हरगिज़ सझती न करना । लोगों के दिलों के! खुश रखना । तुम से किसी के नफ़रत न दो पावे | मिलजुल कर काम करना | लोगों के। यह समभझाना कि एक खुदा ही सब का ईश्वर है ओर उसी की सबके पूजा करनी चाहिये। फिर उन्हें दान का मतलब बताना, वद्द यह कि तुम में जो मालदार हूं उनसे लेकर जो भ्रीव हैं उनके देना। जब वे दान दें तो उनसे चुनकर अच्छी अच्छी चीज़ें न ले लेना | जिस आदमी के ऊपर किसी तरद्द का भी जुल्म या ज़्यादती की जाती है, उसकी आद से डरते रहना, क्योंकि उसकी आह के और परमात्मा के बीच भें कोई परदा नहीं है |” (बुख़ारी)
इसलाम के इन उपदेशों से पुराने क्वीले और उनकी ताक़त हृटती चली गई, और उनकी जगह एक जवरदस्त और बहुत बड़ी विरादरी, एक नई क्रीम वनती गई, जिससे सदियों के लड़ाई मगढ़े खत्म होकर देश भर में अमन ओर आमान की सूरतें दिखाई देने लगीं ।
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इस्लाम के कुछ उपदेश देने दाले ११४,
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# ५... २७ सं... की ५
जो लोग अब अपने पुराने कत्रीलों के बीच के कगदी प्योर बदला लेने का मुहन्मद साहब से आकर जिक्र करने ८, इस वे हमेशा करान की ये आयतें सनाते थ--
“दुराई का बदला भलाई से दो ।” (२३-५६)
“अगर तुम चाहते हो कि अल्लाह दुग्हें माझ करदे तो चाहिए कि तुम दूसरों के कयूरों णे माफ़ पर दो कौर उन्टें भुप लाओ, अल्लाह माफ़ करने वाला और दयावान है ।” (२४-२२)
“जमीन और आउमान से बढ़कर वद्ी जन्नत (स्वर्ग) इन तो के लिये तच्यार दे जो बुराई ने दचते है, जो ग्रीदी में छोर धरम: में दोनों में खूब दान देते हैं, जो अपने गुल्ले गे हा में गगाते
हे अर जो लोगों छः सच कदर माफ दर लत ष्ः | खाट इन्त २ प्यार करता ऐ तो दूसरों पर एदरान करने एं । (३-१४२. १६३)
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देश-दग़ा की सज़ा
+*+-सकैंसम् फिकमकुक-क-
मदीने में ओर उसके आसपास कुछ यहूदी क़बीले रहते थे। जहां तक पता चलता है, ये लोग, कई सो बरस पहले रोम के सम्नाठ हृद्वियन के ज़माने में, रोम के जुल्मों से लाचार होकर अपने मुल्क फ़िलस्तीन से भाग कर अरब में आकर बसे थे। ये लोग मुहम्मद साहव को इतनी जल्दी अपना धरम गुरु या सरदार मानने को तय्यार न हो सकते थे, जितनी जल्दी अरब के और कवीले | इसकी एक साफ वजह यह भी थी कि अरबों में इससे पहले कभी क़ोई पैशम्बर न हुआ था। लेकिन यहूदियों में हज़रत इवराद्यीम से लेकर हज़रत मूसा तक बहुत से पैशम्बर हो चुके थे। इसलिए यहूदी इतनी आसानी से किसी नए आदमी को और वह भी एक अरब को पैग्नम्वर मानने को तय्यार न थे, और राज काज में उन्हें अपना राजा या सरदार मानने में भी अपनी हेटी समभते थे ।
मुहम्भद साहब ने मदीने आते ही इन यहूदियों के साथ सुलह से रहने की वहुत कोशिशें की, लेकिन उन पर ज़्यादह
देश-दगा की रुज़ञा ११३
असर न हुआ । कुछ यहूदी कर्मी कमी घन््दर ही घन्दर झअऋरों से मिलकर दग़ा की सोचते रहते थे। इनमें से हुद ने स्पृतदक की लड़ाई में ऐेन मौके पर छुरैंश के साथ मिल ज्ञाने उ॑ कोशिश की थी, और छुछ ने उन्हें अन्दर ही प्रन्द्र मदः दी थी।
मशहूर इतिद्ासकार ( मवरिख्त ) स्टेनले लेनपूल लिस्यना * --
है
5 जनक
५ ,... वयहुदियों ने हसलाम फो दुरा दएना, उसकी हंसी उदाना, झोर जिस तरद उन्हें दूक उसका उस तरद इसलाम फे पैगम्दर पं दिक करना शुरू किया |...इसमें शक नरीं लय तक दया वी शा राषनी थी, तब तक मुहम्मद सादव ने उनके ठाय दया छा राल्ड जिया । उन्हों ने उनके खाथ एक उमकोता पर लिया पा, लिस्में ग्रहलग्पनों झौर यहूदियों सब्र फे अलग अलग दृहू तय वर दिये गए पे | उन्हें शअपने धमं के पालन फी पूरी आज़ादी थी | समम्भेते में लिएने गेम शामिल ये उन रुव को दिफ्लाह्त पा वचन ऐ दिया गया था चोर उनका दर दूर कर दिया गया था। फिसी पर भी दाहइर में ए४ एम्स करे तो उसकी मदद दरना ठव था धर्म दरराया गया था ......
“तने से भी यदहुदियों पी तसज्दी ने एव । उन्टो ने गरिमा प्रणट छेट हाथ शुरू पर दी। ैभुन लोगों ने मदीने ऐ राएर छे शिरणण हिए दिए हर गुट # है + हे बन्दिया दीं। मृत्म्मद टाएद शिएः इनसललरश उम्र जे शानाने हे ए
ध
न ये, घट म्दीने छे रादशाट भी पे, चोर शएर शे छऋमन कौर अमान
श्श्च हज़रत मरुदम्मर और इसलाम
के लिये ज्ञिम्मेवार ये | पेग्रम्बर को हैसियत से वह यहूदियों के इन इमलों को दाल सकते थे. .....पर शहर के दाकिम की हैसियत से, ऐसे दिनों में जब कि लगातार लड़ाइयां होती रहती थीं, मुहम्मद साहब दशा की तरफ से बेपरवाह न दो सकते थे।| एक ऐसे दल को दवाना जिसकी मदद से दुशमन की फ़ोजें कभी भी नगर को लूट सकती थीं, ओर एक बार क़रीब क़रीब लूट ही लिया था, अपनी सारी प्रजा की तरफ मुहम्मद साहब का धर्म था |
“करीब आधे दरजन यहूदियों को जो अपनी ज़्यादतियों के लिये, ओर मदीने के दुशमनों तक ख़बर पहुँचाने के लिये मशहूर थे, मौत की सज़ा दी गईं | तीन यहूदी क़बीलों में से दो को, जो इससे पहले देश निकाले की सज़ा पाकर ही बाहर से वहां आए ये, फिर यही सज़ा दी
“जो सज़ा तीन क़बीलों को दी गई उसमे देश निकाले की सज़ा जो दो कृवीलों को दी गई काफ़ी नरम थी | ये लोग बगावत करते रहते थे। मदीने के लोगों को एक दूसरे से लड़ाते रहते थे। आमख़ीर में एक बार कुछ झगड़ा हुआ । शहर में वलवा हो गया | नतीजा यह हुआ कि इनमें से एक कवीले को देश से निकाल दिया गया | इसी तरद्द सरकारी हुकुमों को न मानने, दुशमनों से मिल जाने ओर खुद पैगृम्बर की हत्या के लिये गुटवन्दी करने के इलज़ाम में दूसरे कबीले को देश निकाले की सजा दी गई। इन दोनों क़बीलों ने पिछले समभोते की शर्तों को तोड़ा था, और मुहम्मद साहव और उनके धर्म दोनों की हंसी उड़ाने और उन्हें मिटाने की दर तरद्द कोशिश की
अनागाननी ्__
देश-दग़ा कौ रुज़ा ११९
थी | सवाल सिफक्र यद है कि ज्ो सजा उन्हें दी गई उरम झमारन मे ज़्यादद नरमी थी या नहीं ?*+
जिन दो फ़बीलों को देशनिकाला दिया गया, उनसे सिरे या हुकुम था कि सिवाय हथियारों के अपना बाफ्ी सब मार असवाब अपने साथ ले जाओ, और मदीना राज से दर जहां चादे चले जाओ ॥+
इन यहूदियों की उन दिनों यह हालत थी कि एक यार प* यहूदियों ने मुहम्मद साहब से आकर कटा दि हमारा फरील्य इसलास धस अपनाना चाहता है, समझाने के लिये हुए पारमी हमारे साथ भेज दीजिये। छे 'पादमी उनके काने पर उन साथ भेज दिये गए | रास्ते में जब ये छे मुसलमान एश नाई के किनारे आराम कर रहे थे, साथवाल यादी प्रधानण उन पर टूट पड़े, उनमें से चार फो उन्हों ने वी मार हास्य 'शर वाफ़ी दो को मक्के ले जाकर करंदा के एदाले झर दिये. जरा " ओर भी बेदरदी के साथ मार डाले गए।
न
एक दसरी वार क्द यहदियों में पाकर पपसे यो सुसलगान
वताया और कहा कि किसी दशमन ने हम पर हमला शिया ,
हमारी सद॒द के लिये झ्लाइमी दीकिय।४५ पिरमाी सुर
5 5ध्योएए (्ाए रिए्ली ॥ ४ एस्यटटपतत १ 5. ९ए., [5008 5ल्0600॥5 जा ॥< ऐीि9"-न ॥6 ् औैफिकराशधारत, 5७ ५5" | 9 ६०८००
१२० इक्षरत मुहम्मद और इसलाम
उनके साथ भेज दिये गए। रास्ते में एक नदी के किनारे इनमें से ६६ को उसी तरह दगा दे कर मार डाला गया ।
एक बार एक यहूदी क्बीले ने मुहम्मद साहब की दावत को । दीवार से पीठ लगाए मुहम्मद साहब बेखटके खाना खा रहे थे ओर चाल यह थी कि ऊपर से एक भारी चक्की का पाट अचानक उनके ऊपर इस तरह लुढ़का दिया जावे कि वह वहीं ख़त्म हो जाचें । पर ठीक वक्त पर इस चालबाज़ी का पता लग गया । सुहम्मद साहब बच गए |
चद्दी इतिहासकार उसके बाद लिखता है---
“तीसरे कबीले की आगे के लिये एक डराने वाली मिसाल कायम की गई। फ़ैसला मुहम्मद साइब का दिया हुआ नहीं था, बल्कि एक पंच का दिया हुआ था, जिसे यहूदियों ने खुद श्रपनी तरफ़ से पंच बनाया था | जब कुरैश और उनके साथियों ने मदीने को घेर रखा था ओर शद्दर की दीवारों को क़रीब क़रीव तोड़ डाला था, उस वक्त इस यहूदी क़बीले वालों ने दुशमन से मिलकर गुटबन्दी शुरू की । पैगम्बर की दोशियारी से वात खुल गई और चल न सकी | जब दुशमन द्वार कर लौट गया तो जैसा चाहिये, मुहम्मद साहब ने यहूदियों से जवाब तलब किया | उन्होंने जवाब देने से इनकार किया | उन्हें घेर लिया गया। लाचार द्ोकर उन्होंने द्वार मान ली। उनकी प्राथना पर मुहम्मद साहब ने इस बात को मान लिया कि एक ऐसे क़बीले का सरदार, जिसका यहूदियों के साथ मेल मिलाप था, उनके लिये सज़ा तय करे। यद्द उस आदमी ने फेसला दिया कि बागी
की
देश-दगा की रुतज़ा श्
कृवीले के कुल यहूदी मद जिनकी तादाद करीद ६०८ थी पतल दिये जावे और श्रौरतें शोर बच्चे गुलाम बना लिये लाईें
“फुसला सज़्त और ख़ूनी था। लेकिन हमें मद नहीं भूलना चाहिये कि इन लोगों का क़दूर राज के ख़िलाफ़ गुट्यन्दी घर दंगा करना था ओर वद्द जब कि दुशमन ने नगर को प्रेर रग था। लोगों ने इतिहास में पढ़े ग्या हे कि ठपक खाफ वेखिएटने मेडन का सारा रास्ता इसी से पदचाना जा सकता था कि रास्ते भर दर्ग्नों के ऊपर फ़ौज को छोड़कर मागने वालों झीर लूटने दालों पी तारों लटकी हुई दिखाई देती थीं, उन्हें एक देश भरे दगा परने पाले ग़रीजे के इस तरद मार डाले जाने पर ध्रचरज नहीं दोना चादिये ॥ $
मिरडा अथुल फ्ज़ल ने लिखा हूँ कि युद यददियों में लड़ाई के जो फ़ायद थे यह प्रीसला उन कायदों फे पत्र या। लेकिन मुहम्मद साहव ने औरतों और बच्चों के साप एस सदन की इजाजत न दी औौर--वबाद में सब ओरतों पीर पर मो पाज़ाद फर दिया गया। फिसी एक की भी घलास दनाण्र नहीं बेचा गया ।” जिन ६०० मदा फो मात पी सनाऋ गर थी उनमें से भी मुहम्मद साहद ने 2८४८० दो माझ पर दिया। सिफ़ "दो सौ दी को यह सझ्ा दी गई । "
यही मुहम्मद सादव पी दिन्दगी पा सूद से संगत जाम सिना जाता है ।
(७:.9::९०0.6-॥-+-ह४3+न) >> ३१७ काम ३ कै "कप +मीै ७4७०९: ०० शीअीमाा+शमाजप जम सके 2030... पी २०-+म/ााए हनितपाम्यररम काफी. अप बआबी.. धन.
जे 5 पिजोीटज ठच्चह तो जा 5 उक्रर्फ 3८5४० ६१ “806९00०75५ वणा। ऐैर ऐीएएछ, 7 0४ ४ ४ 7:४:
2,
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मक्के की पहली यात्रा
सकक्के से आए हुए मुसलमानों को अपनी जन्मभूमि छोड़े डे साल हो चुके थे। उनमें से बहुतसों के वाल बच्चे अभी तक मकक्के में थे। कुरान में जिक्र आता है कि उनके इन चालवच्चों के साथ क़ुरैश की ज्यादत्तियों की खबरें मुहम्मद साहब के कानों तक वार वार पहुँचती रहती थीं। भुहम्मद साहब की उम्र अब क़रीव ६० साल की थी । ज़ाहिर था कि जब तक मक्के ओर सदीने में दो जबरदस्त ताक़तें एक दूसरे की दुशमन वनी रहेंगी, तव॒ तक अरव में अमन शान्ति नहीं रह सकती थी । मुहस्मद साहव शुरू से ही जितने बेचेन अरबों के विचारों को सुधारने के लिए थे, उतने ही था उससे भी ज्यादह वेचेन सारे अरव को एक क्रोम देखने के लिये थे। बिना इस के अरब का आज़ाद ओर सुखी रह सकना हो ही नहीं सकता था; काबे के साथ मुसलमानों को भी वेसाही प्रेम था जेसा पुराने खयाल के अरवों को । कावे की घचुनियाद डालने वाले हज़रत इवराहीम को सुसलमान पैग़रम्वर मानते थे। मुहम्मद साहब दुनिया भर के
ंंभााांध्आाआा 4 5 >> फल]
0
मक्के की पदली था १२२ बढ़े से बढ़े और पुराने से पुराने तीथांँ में गिने जाने बाले पादे किया कण व किया 8. क्र नाक इक के इस तीथ के बढ़प्पन को और उसकी यात्रा की 7द्ध को भी
हे +ऋ्न् की
खूब समझते थे। दज्ज के दिनों में दूसरे अरबा की तगट मुससमा को भी काने की यात्रा का हक था। महम्मद साइय साथ, विना लड़े ओर बिना हथियार उठाये, र्राज फल ऊे शद्र: में “अदिसात्मक सत्याग्रह” के ज़रिये रस हम को वास में लाने ओर इसी के ज़रिये मकके बालों पौर मदीने बालों पे एक प्रेम डोर मे बांधने का फ्रेसना झिया |
मुहस्मठ साहव ने मकके की यात्रा का इरादा शिप्रा। टीफ हज्ज के महीने में ज़ब कि अरबों की तमाम आपस थी लाणतयां बन्द हो जाती थीं, १४०० आदनियों » साथ झग्ग्मद स्थाए मक्के की हज के लिये चले। चनन्ने से पदले या ' पट मे टेदिय कोई शख्स हृथियार बांध कर न झाए।" ( मिली ) लाए के खास हथियार तीर कमान या भाला एफ भी दिसी ऊे पास मे था। इस पर भी मक््के दालो थो पूरी नर के लिए साउने हज्ज के वह कपड़े ( एट्राम ) पहने जिसो पनम हर गाउमो कसी चींदी को भी नहों मार सडता ऋर न पता भोए सकता है। रासले से झादनी सेज् फर शास्मण सामाए में कुरेश से हुज की इज्ाद़त मांगी | एरेग में इनशार पर
कण परस्रपधनट | ि#०स... कक न जल लकी अमन री दिया, जोर एक दृधियारदन्दर झोव निल्लथे शुमनागानों ४
4; ग। न ् 3६ # ४ | ।ए
ष्पू
शक
१२४ इच्तरत मुहम्मद और इसलाम
और ख़ुद मुहम्मद साहव पर तीर चलाये । मुसलमानों की तरफ़ से कोई जवाब नहीं दिया गया । मुसलमानों की तादाद ज्यादह थी | उन््हों ने इन ८० क्ुरैश को जिन्दा पकड़े कर मुहम्मद साहब के सामने लाकर खड़ा हैं: दिया | मुहम्मद साहव ने उन सव को साफ़ कर दिया आओऔर इस चादे पर छोड़ दिया कि हम दोवारा मुसलमानों के खिलाक़ हथियार न डठावेंगे । इस मौके पर मुहम्मद साहव ओर उनके साथियों का सारा वर्ताव सच्चे “सत्याग्रहियों? का सा था। १४०० आदमी बिना किसी तरह के दृथियार के और बिना दूसरे पर दाथ उठाये अपने हक़ के लिए डटे थे। कुरैश पर इसका गहरा असर पड़ा ।
हुदेवियाह की सुलह
दोनो तरफ़ के खास खास लोग जमा शए। झुला। शी शा
लिखी जाने लगी। मुहम्मद साहब बोलने जाते थे कौर पा लिखते जाते थे “अल्लाह फे नाम पर जो रहमान प्र रीम
है !” करेश ने रोक दिया पौर लिखाया “प्टाट मेरे नाम पर !” मुहग्मर साटव ने मान लिया। फिर झुंसा शिश-
“मुहन्मद, अल्लाह के रसूल छी तराझ से” फरेश ने फिर गो ओर लिखाया ' प्रब्दज़ा के देदे मुहस्मद की मरण से) गागस्स: साहव ने फिर तुरत मान लिया 'प्रौर पिन हाथ से शाद एर
ठीक कर दिया। सास शर्तें थे तय पाए--
कक हि
१--फरेश मे से कोर शायर बिना पररने यों रा सगगर से पूछे मुएन््मद के पास जावेगा तो उसे एस्श हे पौस यापर लोटा दिया जायगा ।
श् हे कर अकुम्णकृलर गहा#>+-्गकृफ-यूढः.. ?नयडननआ?०माम पाक
.ह फ्क फ्, २--मुसलमानो में से को फोर मर्श पास
कर । #
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हर. जऊायगा उस दाएन ने किया जायदा |
१२६ इज़रत मुहम्मद ओर इसलाम
३--हर क़बवीले को आज़ादी होगी कि चह क़्रेश या मुहम्मद जिससे चाहे मिल कर रहे ।
४--इस बार मुसलमान विना हज्ज किये वहीं से वापिस मदीने लौट जांय ।
५१--अगले द्स साल तक क्रैश ओर मुसलमानों में लड़ाइयां बन्द रहें |
६--अगले साल मुसलमानों को हज्ज के लिये मका आने ओर तीन दिन तक मकक्के में रहने की इजाजत होगी ।
क्रैश और मुहम्मद साहब के वीच की यह सुलह “हुदेबियाह” की सुलह के नाम से मशहूर है। इसकी आखरी दोनों शर्त मुहम्मद साहव की तसल्ली के लिए काफी थीं ।
मुहम्मद साहब ने सच्चाई के साथ इस सुलह की शर्तों पर अमल किया। एक नौजवान क्रैश लड़का मुहम्मद साहब के पास पहुँचा। वह अपने की मुसलमान कहता था। उसने मुहम्मद साहव के साथ रहना चाहा। लड़के के वाप ने आकर सुहम्मद साहब को सुलह की शर्तों की याद दिलाई । मोहम्मद साहब ने लड़के को वाप के साथ वापिस जाने पर मजबूर किया ओर उसे दुःखी देख तसल्ली देते हुए कहा--“सत्र करो और अल्लाह पर भरोसा करो, तुम्हारे ओर तुम्हारे जैसे दूसरों के छुटकारे का वह ज़रूर कोई न कोई रास्ता निकालेगा ।”
इसी तरह की और भी कई मिसालें मिलती हैं। मकक्के में ऐसे लोग बढ़ते जा रहे थे, जिनके दिल मुहम्मद साहब के साथ
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मकक््के की दूसरी यात्रा
एक साल बीतने पर, जैसा तय हो चुका था, मुसलमानों के मक्के जाने का वक्त आया। सन् ६२६ ईसवी में २००० मुसलमानों को साथ लेकर काबे की हज्ज के लिए मुहम्मद साहव फिर सकक्के की तरफ चले । फिर इन २००० में से किसी के पास कोई हथियार न था। उनके कपड़े हाजियों के कपड़े थे । इनमें जो लोग सात साल से अपने घरों से निकले हुए थे मकके पहुँचते ही उनकी खुशी का ठिकाना न रहा |
४धउचमुच मक्के की घाटी में जो चीज़ उस वक्त देखने को मिली वह दुनिया के इतिद्दास ( तारीम़ ) में अनोखी थी। मक्के के सव छोटे बड़े लोगों ने वीन दिन के लिये उस पुराने शद्दर को ख़ाली कर दिया | दर घर सूना पड़ा था | जब वे चले गए तो अपनों से बिछुड़े मुसलमान, जो वरसों अपने घरों से दूर रद्द चुके थे, एक बहुत बड़ी तादाद में अपने नए! साथियों को लेकर फिर अपने बचपन के ख़ाली घरों में आए और थोड़े से वक्त में उन्होंने हज की रस्में पूरी कीं । मका वाले चारों त्तरफ़ की पहाड़ियों पर, खेमों में या घादियों के साए
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लगाते (परिक्रमा तवाफू करते) और जेसा पराना रिदात था सफ़ा और मरवा की परहाः वे बढ़े शीक के साथ इतनी दुर भे हर आदमी ऊँ
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१३० हज़रत मुहम्मद और इसलाम
दुखता। मक्के के लोग मुसलमानों के इस बताव को देख कर दंग रह गए और उन्हों ने तसल्ली की सांस ली। मुसल- मानों के मदीने चल देने पर वे फिर अपने अपने घरों में
ऋागए ।
यहदियों ओर मुसलमानों में मेल
मुसलमानों के इस चतांव से इसलाम की जदें लोगों के दिलों में जमगई । बहुत से बड़े बढ़े फुरेश मुसलमान हो गए। इसलाम के माननेवालों की तादाद तेज्ञी से ददने लगी पर आस पास के कवीलो ने जल्दी जल्दी नए पैगम्वर के घम प्रार उसके राज़ दोनो को मानना शुरू वर दिया
लेकिन यहूदियों की दुशमनी 'रभी तक पूरी तरह छा न हुई थी | मुहम्मद साहबच को मकक्छे से स्टज्र उनजे साथ आखरी मोरचा लेना पढ़ा। अरब में फझावियों झा सपसे घटा गढ़ मदीने से कोई १०० सील उत्तर में एक शार साप्यण्था। झूछ बारी यहूदी झार कुछ घोर झदीले मीन पर एमला णश्ने के इरादे से खेवर के आस पास जमा दो गए |
मसटससद साहब ने 5१४०८ प्यादमियों दो लजर नोंदर प्र पढ़ाई की | उन््हों ने यूदियों से सलाद ये लिये प्फा, लेगिन घेर । यह इलाजा पहाड़ी था छोर शसमे दूत से मदए -
१३२ हजरत मुहम्मद और इसलाम
थे। कई हफ़े लड़ाई होती रही, जिसमें अबुबक्र, उमर और अली तीनों ने हिस्सा लिया । आखीर एक एक कर सब क़रिले मुसल- मानों के हाथों में आगए | अब यहूदियो ने सुलह चाही। उनकी वात सान ली गई। उन्हें अपने धममं पर चलने की पूरी आज़ादी दे दी गई | उनकी जमीने' ओर साल असवाब सब उन्हें वापिस दे दिया गया। ओर जन्हों ने सदीने की क्रोसी सरकार को अपनी सरकार मान लिया। यहूदी ओर मुसलमान अब से 'एक मिली हुई क्रोम एक “उम्मत” वन गए।
मुहस्मद साहब अभी खेबर के क़िले में ही थे कि उनकी जान लेने की फिर एक कोशिश की गई। एक यहूदी औरत ने मुहस्मद साहव और उनके साथियों के लिये खाना परसा, जिसमें ज़हर मिला दिया गया था | उनका एक साथी दो चार कोर खाकर मर गया। मुहस्मद साहव भी पता लगने से पहले खाना चख चुक्रे थे। उनकी जान बचगई लेकिन अन्दर जो ज़हर जा चुका था, उसके सवव वाक़ी ज़िन्दगी भर उन्हें दुःख भोगना पड़ा । मुहम्मद साहब ने उस औरत को बिलकुल माफ़ कर दिया ओर सुलह की शर्तों पर इसका कोई असर नहीं पड़ने दिया।
क्रैश के साथ कम से कम दस साल के लिये सुलह हो चुकी थी । यहूदियों की दुशमनी भी ठण्डी हो चुकी थी। मदीने की ताकत वढ़ रही थी। इसलिये १५ साल पहले जो मुसलमान अपने धम को बचाने के लिये इथियोपिया भागकर चले गए थे, उनमे से बहुत से अब अपने देश लोटकर मदीने में रहने लगे।
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रोम वालों से लड़ाई ओर जीत
अरब के वीच के हिस्से भें जो इन हिना आजाद था. पर कोई खास दुशमन मुहम्मद साहव का न रहा प था। श्स सारे हिस्से के लोग धीरे धीर एक दृश्वर और एक धम के सानने दाने ओर एक फीम बनते ज्ञा रहे थे। मुएन्मद साहब था प्यान अब दक्खिन आर उत्तर के उन अरब इलाका की तराम गया जो विदेशी वादशाहों के हाथ में थे। दम्यिन में यमन जर उसके पास के उपजाऊ इलाके से बीच हधियोपिया ऊे ध्साई चादशाह के हाथों से निकल कर हइरान के दउरशरस्दी सस्गंट खुसरो परवीज्ञ के हाथ में झाचुफे थे पर शाम से मिते हुए उत्तर के कुछ सूचे रोम के ईसाई ससराट झे सानटल थे। जो मय रोम के हाथ में थे. वहां फी प्रस्थ प्रजा फो भी शुसाई बनणर ही रहना पड़ता था ।
कक. ध न शरान झोर राम एन दानों परी तादइना जा सलशादार प्प्पर्मो
कु लडाइयो 'पोर दानों वी गिरती एऋह हालत में मुहस्भाठ साशए
५२४ दचतरत मुहम्मद ओर इसलाम
खब जानते थे। रोम के राज में इंसाई धम की गिरावट ओर इंरान में पुराने पारसी धर्म की उन दिनों की घुरी हालत भी उनकी आंखों से ओमल न थी। उन्हें मालूस था कि रोम के सारे राज में धम की आज़ादी का कहीं निशान न था, इसाई सम्राटों और पादरियों की छोटी निगाह इस हद को पहुँच गई थी कि साइन्स, वैद्यक वर्गेरह का पढ़ना पढ़ाना वहां जुम था और धर्म के नाम परआए दिन हजारों और लाखों मनुष्य जिन्दा जलाए जा रहे थे ओर तलवार के घाट उतारे जा रहे थे। ऐसे ही ईरान में उस ज़माने के ज़रथधुल्ली धमं ने लाखों ऐसे पेशे वालों को जिन्हें अपने पेशे में आग काम में लानी पड़ती थी, जेसे सुनार, लोहार वरेरह हिन्दुस्तान के अछातों से भी बुरी हालत को पहुँचा रखा था। मुहम्मद साहव ने सोचा कि अगर इन दोनों जगह के सम्राट इसलाम धम अपनालें, यानी और सच चीजों को छोड़कर सिर्फ एक अल्लाह की पूजा करने लगें, और सब आदमियों को एक वरावर समझने लगें, तो इन दोनों देशों का सुधार भी आसान हो जाय ओर उनकी अरब श्रज्ञा को भी इसलाम अपनाने का सुभीता हो जाय ।
उन्हों ने वेधड़क आस पास के वादशाहों को इसलाम धमम मान लेने को लिखा और खास आदमियों के हाथ ६२८ ई० में इनके पास खत भेजे, जिनमें उन्हें अपने बहुत से देवी देवताओं ओर बुतों की पूजा और निकम्मी वहसों को छोड़कर एक निराकार अल्लाह की पूजा करने का उपदेश दिया। इनमें दे।
रोम बालों ने लड़ाई और जीत श्झ्पू
खत्त खास थे, एक कुल्तुनतुनिया मे रोम के सम्नाद हिरिकिलि्रिस के नाम और दूसरा ईरान के सम्राट खुसरू परवीझ के नाम । तीन ओर खत, एक यमन के हाकिम के नास, एज मिल ऊे हाकिम के नाम ओर एक इथियोपिया के बादशाह के नाम » हिरेक्लियस न खत पाकर मुहस्मद साहव के चलन बगेरा बारे में ओर ज़्यादह जानना चाहा: लेकिन परदीज ने था घमणड के साथ खत फाइकर फेंक दिया।
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मुहम्मद साहब ने अब इन सच सरहदी अरब इत्वनों मे इसलाम धर्म सममाने वाले भेजने शुरू झिये। इनमे उग्य उसर की तरफ शाम की सरहद पर के पप्ररव ऋबीलों के पास गण। रोस के सम्राट अपने राज़ में मज़हब की 'प्राज्ञादी छः नाम सुनना भी न सद्द सकते थे ।
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मुहम्मर साहब रे भेज हए झादसियों फ् सें टपर होनी ही थी।
रोम के मातहत '्रस्भान का हाफिन गरबार शे इस्मार परव था। उसे सुहस्सद साहब क्ञ नया धन पएसनर गा गया। उसने इसलाम अपना लिणय फोर गशाम्मर खाए रो शाजा
हि के 5०5 का के रादरग्भर <>कन्ब्याइराआा मन पकमा जलकर संडमन्काप्ममबीकट हक. ऋष्ण्गड्ा>-गन्गाकक मकान >क जज
संज्ञा | द्द्दा ऐस रांची ७४०२४ ४६४. # ः हे फए्ा आअआनक्चा गया पद्ुल के ७. कक का. के न््ग्यि “मी हू 22
फ्रदाह फो फिर से इसाह € जाने के लिए मिरण फिर झा
ल हि. के ्छ. उाद नाक म्ड। दैट शक सी श्या जह->१०यक का" नी > छो तनखाह पार प्राटई मे तरह पा सास स्या। फरार के
१३६ हज़रत मुहम्मद और इसलाम
इस पर मुहम्मद साहव ने रोम की हकूमत के साथ एक तरह का सत्याग्रह शुरू कर दिया। वह अपने देशवासी अरवों में इसलास फेलाने की आज़ादी चाहते थे। शाम की सरहद पर अरव कचीलों में इसलास फैलाने के लिये मुहम्मद साहव ने दस दस, वीस बीस सुसलमानों के जत्थे भेजने शुरू किये। इन जत्थों में स इका दुका आदमी बचकर सदीने तक चापिस आता था । वाक्ी सब सार डाले जाते थे। इतने वड़े राज के अन्दर इन छोटे छोटे जत्थों का कोई फ्रोजी या राजकाजी मतलब न हो सकता था। मुहम्मद साहब की ग़रज् सिफ अरखों में इसलाम फैलाना था। पर रोम के हाकिम अपनी प्रजा को इस तरह की आज़ादी देना न चाहते थे।
मुहम्मद साहब ने सव शिकायतें लिखकर एक खत वोसरा (फिलिस्तीन) के ईपाई गवरनर के नाम एक खास आदमी के हाथ भेजा । रास्ते ही में मौतह के ईसाई हाकिम शुरहवील ने उस आदमी को मारडाला ।
यह वात याद रखनी चाहिये कि जिन इलाक़ों में मुहम्मद साहव के उपदेश देने वाले जाते थे ओर मारडाले जाते थे वह सच अरब ही के हिस्से थे, ओर अरबों ही की वहां आवादी थी। मुहम्मद साहब के पास अब सिवाय लड़ने के ओर कोई चारा नथा ओर लड़ाई भी इतने बड़े राज के साथ। तीन हज़ार हथियारवन्द सिपाही मुहम्मद साहव के पुराने साथी जेद के मात्तहत मौत्तह की तरफ भेजे गए। इस फ़ोज में ज़ेद के अलावा
रोम बालों से लड़ाई श्रौर जींद
क्णण्छफीँ
था रु
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आर कई मशहूर मुसलिम सरदार थे। इनमें एक घचतानिय का वेंटा अली का भाई जाफर था, जिसने इधियोपिया इसाई बादशाह के सामने मुसलमानों की वकाननत की थी. दूसरा मशहूर मुसलमान वहद्दादुर आर शायर पहऋुद्ाद था. तीसरा वलीद का बेटा खालिद था. जो कमी सुदृस्मद सा का कट्टर दुशमन रह चुका था ओर जो बाद में इसलाम सबसे बड़े फीजी सरदारों मे से हआ। इन घारव सरदारो रहते एक आज़ाद हुए हब्शी गुलाम जंद हो सारी फॉज़ जा ओर सव सरदारों का सरदार बनाना मुहन्मद साहथ छी नर स अरबी के अपनी नसल ओर खानदान के घमरट पर एड खासा वार था ।
श ञ १
चलते वक्त मुहम्मद साहब ने जद को दिदायन दी--
“लोगों के ठाथ नरमी का दर्ताव फरना, प्रोरतों, दसों, गई साधुओं झ्ौर कमज़ोरों पर किसी दालत में नो एमत्य ने गरना, ने हिर का घर गिराना प्लोर न कोई फलदार दरघ्ज्त पादना |
है के
रासे मे इन लोगों को पता चला छि. एक घात दागी रोग
की फौल सम्राट दिरेस्लियस के भाई घियोटोरस के सादास
कुछ की राय हुई कि झुहस्मद साटद छे पास रारसी भशग्र
फिर से उनकी राय ले ल॑ कहा “हम तादाद के भरोसे 'पागे नही परे. एस सिंय शाएट
| जाय। फदत्दजाश ने अशएर करा चर
न
ँ'+पकक
श््श्८ हज़रत मुहम्मद छोर इसलाम
की राह पर और उसी की मदद की उम्मीद में घर से निकले हें । जीतेंगे तो नाम है। मरेंगे तो जन्नत ॥7
अपने नए धम की सच्चाई के अन्दर इस अठल विश्वास ने डी सातवीं सदी के अरबों में वह ताकत पेदा कर दी थी, जिससे वे वड़ी से वड़ी सीखी हुई फ्रोजों ओर वड़ी वड़ी हकूमतों के सामने भी मेदान पर मैदान जीतते चले गए ।
मोतह नगर के पास दोनों फ्रोजों में मुठभेड़ हुईं। इसलाम का मण्डा जैद के हाथों में था। जैद के गहरा जख्म लगा। भण्डा उसके हाथों से गिरने ही को था कि जाफर ने आगे वढ़कर भण्डे को ऊंचा किया। लड़ाई का सारा ज़ोर इसी भण्डे के आसपास था। जिस हाथ में जाफर ने भण्डा थामा वह हाथ कट कर गिर गया। जाफ़र ने दूसरे हाथ से मण्डा सम्हाला वह भी कट कर गिर गया | जाफ़र ने अपने दोनों लहू लहान चाजुओं से भूण्डा दावे रखा। एक ओर वार में जाफर की खोपड़ी के दुकड़े उड़ गए | जाफ़र गिर गया | अच्छुल्लाह ने चढ़ कर मण्डा अपने हाथ में लिया। अव्दुल्लाह भी कट कर गिर गया | खालिद ने अच्दुल्लाह की जगह ली ओर चीरता हुआ कुछ दूर तक रोम की फ्रोज के अन्दर घुस गया। इतने में शाम हो गई। दोनों फ्रौज़ों को एक दूसरे की वहादुरी का काफी
# इतो वा प्राप्स्वसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्से मदहीम?--- भगवदगीता |
रोम वालों से लड़ाई और जीत १३०
अन्दाज़ा हो चुका था। दोनों ने नय किया कि रान को अपनी अपनी जगह आराम करें ओर सुदर्ह को ऋद्गाई फिर शुरू से । लिखा है उस विन की लड़ाई में खालिद के शायों मे ना तलवार टूटी ।
बे
दूसरे दिन खालिद न, जो अब जद की जगह सारी सी का सरदार था, इस हाशियारी के साथ रोज़ हो रच जिया
व
श चर श् आर मुसलमान जत्थों को लग झलग मरफ से फ्रांस बाण कि थोड़ी ही देर बाद रोम की फाज् पीदे हटने लगी। उनमे
का]
भगदड़ मच गई । कुछ दर तक खालिद ने उनझा पीछा जिएा । लेकिन दो दिन की लड़ाई से फाक़ी सुसतमान मर चघूरे थे पर काफी घायल हो चुके थे। थोड़ी देर तक भागते एुए दृगामन शा पीछा करन के बाद रोम की पोल का बहत सा गीौगती मास
आर उनके छूट हुए हथियार साथ लेकर गखालिद मदीने ४] सर लोटा । यह खालिद दनिया के दड़े से था उरभेलोंया र्ड
...]
सरदारों म शिना जाता ?॥
श्स जञ्ञी ब्म्यक मद ० के. र्णश् नह हज पक कक व अ>क बकरे १०० 2०अन #चकच्यापकत ३ रेस जात पर सदात से साया जार रुज्ञ एइग्ला पाता ० | 5 का...
ञू१हन्मद साहव ने रालिद को गल ऋगाया, रण्न एप एणएर
पे दर कर के द्र 'खाामाकार' पानपाहाप--+गदा रे ५ क जाफर फ॑े यतीम पद फोर दश्ागर ४४ ।य गंदा लाए ए। देसकर सुटम्मद साहब इरए जि हर ते करो किट: हित आए रसंएप कि पास दा एक फार्मा ने शशिन एर्श शा ह। ला|
4 ण्द्ाप कर अन्य +कुतान्नकन तप ल 0० “प् झल्लाए के रसृच - फया रप नी इस गर रात ₹_.
शक
न
१४० हज़रत मुहम्मद ओर इसलाम
इस लड़ाई से मुहम्मद साहव दुनिया में मशहूर होगए। उत्तर अरब के लोग अब बड़ी वड़ी तादाद में इसलाम अपनाने लगे, ओर उत्तर के सूबे एक एक कर रोम के राज से टूटकर मदीने की आजाद क्रोमी सरकार को अपनी सरकार मानने लगे |
मकक्के की जीत
९०.7० ए कारक
मुहस्मद साहब का ध्यान अब फिर सच्छ की दराण गएा। करश के साथ सलह हो चकी थी। लेकिन उए एरगो ने उर
सुलह के खिलाफ खुजासाद फब्रीन पर, को सीने जी सरकार की रिआया ७, हमला ऊर दिया। झगम्मर सागए ने इस बार १०,००० हथियारवन्द्र लेकर मजे पर था: ४३) इस फीज की सरदारी उमर छो सोपी गः
बध ० 4 छ् का के शाम को यह फोज मक्झ का बार जाएर दशा | राग 7५
कण का कक का ड्- को एकुम था छि जहा तम हो से शिसी एर 7 दिएर से चाय,
ब्रः भी ८.5. कि हि हि पधोर अगर कार दामन पफ्रले, को इस पता मभए ; ४४४5३ एए
याद पहर झे छ्टा सिपा्टी दाहर के बारर से था गाःपमिय 77
पकरउजमर गत्समद साएहय रु साूसत लए, हुच एछुर शायर हय॥
जज ग कर
च्ध्ड
4 क सरदार धर पा । कि, सापझ्यान डे £,4 न ते ँ »_ च 0७] | अऋँलक ना + ७ (४+ कर गा है >> सा अंग. आजम अरकिक-ही जय आपका पक न्कमान 2 नल लए हु ब्क | कप ॥ स्प्-पण ब्ल् जय, औ4 आुन्अ १९. झूू ६०० [ १ | (च्च् शपाशल ० ग्श ५ २ ७नटुकी आम गियर च्फ
कक श्
चक कुल. है झ्र्न्त्त र्द्ा प् रू हम दिक्रसयनपाभफ ५३... रहाममूकानुट -दुरनका-नकम कु... "मो अहूनकनाक- हपाम् जगह... हरेक इकतनपामगाकत मय. डक +म इमाम... "०७ हु भ ५३ घ मे ७ अबू ७ १) बोर आर औंध ओआओ काशी ७ का“ गे
१४२ इज़रत मुहम्मद ओर इसलाम
आंखों से टप टप आंसू गिरने लगे । उन््हों ने विना किसी शत्त के अबु सुफियान के सब पुराने क़सूर माफ कर दिये ओर उसे इज्ज़त से वैठाया। अबु सुक्रियान के दिल पर इसका गहरा असर हुआ | चह अहसान से दव गया। अबु सुफ़रियान की माफ़त सक्का- वालों को संदेसा भेजा गया। कहा जाता है कि सिफ़ सुद्वीभर लोगों को छोड़ कर अबु सुक्रियान ने और सबने मुहम्मद साहव को अपना सरदार, और मदीने की सरकार को अपनी क्रोमी सरकार मान लिया। इस तरह चिना एक भी आदमी का खून वहे मक्का जीत लिया गया।
अगले दिन वहुत सवेरे मुहम्मद साहव अपने साथियों को लेकर शहर की तरफ बढ़े। एक दल खालिद के साथ था। लोगों को हिदायत थी कि सब के साथ नरमी और घरदाश्त से काप्त लें ओर अपनी तरफ़ से किसी पर हमला न करें । कहते हैं कुछ कुरैश ने खालिद के दस्ते पर दो चार तीर चला दिये, जिसका खालिद ने भी तलचार से जवाब दिया। मुहम्मद साहव ने उसी दम खुद आगे वढ़कर खालिद को रोक दिया। शहर के बाहर मुहम्मद साहब ने अपने मामूली कपड़े उतार कर ओर हथियार अलग रखकर 'एहराम” वांधा यानी कावे के यात्री के कपड़े पहने ओर विना हथियार अकेले ऊंट पर वेठ कर ठीक सूरज निकलते निकलते शहर के अन्दर पहुँच गए।
“जिन लोगों ने शुरू से अब तक प्रुहम्मदर साहब को इतनी तकलीफ पहुंचाई थीं, वे अव उनके क़दमों पर थे...ऐसे दी वक्त पर
कथ, क्र
मच्ऊे की
0!
ते शा
आदमी अपने असली रंग में दिखाई दठेता है। .. ....शी दात बह५ ठोस द्ोती है, और यद एक सद्यी बात है कि प्रपने दिन्दगी भर के दुशमनों के ऊपर मुहम्मट साटब थी सबसे व. जोत पा उन € अपनी आत्मा के ऊपर भी उनकी उपमे बड़ी जीत णा दिन कुरैश ने बरसों जो उन्हें दुःख पहुँचाए ये, चेरज्लती वीमो चो जुल्म किये थे, मुहम्मद साइब ने सबऊझो खुल दिल से साऊ दर उपा | उन्हों ने मकके के तमाम लोगों का टर दूर कर दिया। गिल इंच उन्हों ने अपने सब से कद्दर दुशमनों के शहर मे जीत फा दिनता रिए हुए. पाव रसा, सिफ़ चार नाम उनके पास ऐसे ये शिसो इन्गाह मे सज़ा देना ज़रूरी था । पेग़म्बर के बाद उनकी पीन ने भी उन्हीं पद मिसाल पर अ्रमल वबरते हुए उण्ठे दिल से घौर चुप चाप शरर कंदम बरढ़ाया। न एक मकान लूटा गया बौर ने एज फौरत ए ब्रेटज़्ज़्ती की गई |?! ह
त्रौ
१
ह।
ज़माच ने के फाजी इतिहास एस से यह सहाय फड दनहार
यात थी। जिन चार आंदनियां फो सदझ्षा देना ऊस्से गा, इनमे से भी तीन को घाद में माफ झर दिया गया।
मकक्के बालो के दिल पर मुएस्मर साशद जी एस पेए
नरमी का इतना गहरा 'बसर पड़ा छि इनके पुर से फटर
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दुशमनों, यहां त्तक कि ऋयु स॒म्यिन से "पौर याद थे पुरोहिए का ९ तक ने इसलाम धम झपना लिया ।
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१४४ हजरत मुहम्मद और इसलाम
सका अब मुसलमान था। काबे के मन्दिर में मूर्तियों के रहने की अब कोई वजह न थी । इसके बाद एक दिन मुहम्मद साहव सीधे कावे के मन्दिर की तरफ़ गए। ऊपर आ चुका है कि काबे में ३६० बुत थे। एक एक घुत के सामने मुहम्मद साहव यह् आयत पढ़ते जाते थे और उनके साथी बुत को उसकी जगह से हटाते जाते थे--“सचमुच अब हक़ ( सच ) क़ायम हो गया ओर वातिल ( झूठ ) उठ गया ॥7*#
इस तरह उस दिन दोपहर तक सक्के और उसके आस पास के सव बुत हमेशा के लिये अपनी पूजा की जगहों से हटा कर अलग कर दिये गए। मूतियां हुट गईं, फिर भी कावा पहले से भी ज्यादह शान के साथ सव अरबों का सव से बड़ा तीथ बना रहा।
ऊपर आ चुका है कि मुहम्मद साहब धर्म के मामले में क्रिसी के साथ किसी तरह की भी जबरदस्ती को ठीक न समभते थे। यमन के ईसाई हाकिम ने इसी काबे के मन्दिर पर हमला करके उस गिराना चाहा था। खुद छुरान के अन्दर उसके इस काम को बुरा वताया गया है| हमला करने वालों पर जो मुसीवत आईं थी उस कुरान ने 'इश्वर की भेजी आफ़त” कहा है | जहां तक सव के लिए मजहवों की आज़ादी का सवाल है, इसलाम मूति पूजने वालों और निराकार के पूजने वालों में
कसम मल पु जींद पुल, का जाप ६ 8 4
फोई फ़रक नहीं करता । सुहस्मद साहब ने दर धरम छे न्नोगों ऊ मन्दिरों, भरठों, गिरज्ञों, सव की दिक्ान दरना साथ शहरों में बार बार मुसलमानों का धर्म ( फ्र्ज ) बताया ।
लेकिन अब न सिफे मक्के के अन्दर बलिक सार घग्द मे फ़राब क़राबर सत्र लॉग मूत्ति पूजा छांड कर एक निराणर इश्वर की पूजा अपना चुके थे। इन लोगो का विश्वास था, जैसा क्रान में लिखा है. कि फाये के कायम करने घाने एडरत इवराहीम ने वहां कोई मूति नहीं बिठाई थीं, 7दराटीमस सिरे एक निराकार की पूजा करते थे ओर बाद में नासमन्ती रे दिनो में काब्रे के अन्दर मृतियां रख दी गए। जो हो, शमी भी धरम की जगह के बारे में वहां फे पूजा करने बालों को परनी शाय मे जो चाहे बदलाव या सुधार करने का पूरा एम है ।
हो सकता हे मुहम्मद साहव यह भी समसते हो जि लिन तरद मैंने अरवो के दिनों यो मूत्रिपृूजा से हटा दिया ?ै, उसी तरह अगर अपने जति जा छऊाघ फ मन्दिर व एन नए, स्ग विरंगी, सडोल, पीर बेटोल लकरी परदपर तादे पीर हद माए की मृति या स दाना ने दर प्रिया तो ए। सराणसा री भरा म्दारा काम मेरे जाते ही समन्दरर णी एफ लएर जी नग्ट
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१४६ हजरत मुहम्मद और इसलाम
के पूजा के तरीक़ों में एक गहरा वदलाव या सुधार करना था। अरबों की सारी क्रोम उन दिनों अपनी केंचुली बदल रही थी | उसकी काया पलट हो रही थी। या गहरे दरदों के साथ एक नई अरव क्रोम जन्म ले रही थी। और मुहम्मद साहव ईश्वर के हाथों में इस कायापलट या केंचुली बदलने के ज़रिये थे या उस देश का तेज़ी से धड़कता हुआ दिल थे।
दोपहर को मुहस्मद साहब के हुकुम से काबे की चोटी से खड़े होकर विलाल ने, जो पहले एक हृव्शी गुलाम थे, ऊंची आवाज़ से शहर ओर बाहर के तमाम लोगों को नमाज़ के लिये चुलाया। विलाल इसलाम के सबसे पहले मुअज्ज़िन ( अज़ान देने वाले ) मशहूर हैं। अज्ञान इसलाम में नमाज़ का कोई हिस्सा नहीं है । सिफ्र जहां आस पास इस तरह के मुसल- मान हों, जिन्हें नमाज़ के लिए बुत्लाना हो, वहां अज़ान बुलाने का तरीक़ा रखा गया है। नमाज़ में काबे की तरफ़ मुंह करने के बारे में, मुहम्मद साहव के पेग़म्बर होने के १३ साल वाद तक जब तक मुहम्भद साहव मकक्के में रहे नमाज़ में किसी खास तरफ़ मुंह करना जरूरी न था। मदीने पहुँचने के वाद सब मुसलमानों के एक जगह इकट्ठ होकर खुले नमाज़ पढ़ने का मौका आया | मदीने में १६ महीने तक मुहम्मद साहव उत्तर की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ाते रहे, और कावा मदीने से ठीक दक्खिन में है। मदीने से उत्तर में वल्कि उत्तर पच्छिम के कोने में यरूसलम है, जिधर यहूदी अपनी पूजा के वक्त मुंह
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किया करते थे। यही उस वक्त तक मुसलमानों का भी >िएचा ( पृजा में जिधर मुंह करते हैं) था। मदीने पॉचने के सॉला महीने बाद, मुहम्मद साहच ने उत्तर से बदल फर दतिरिसन झी तरफ मुंह करके नमाज़ पढ़ाना शुरू किया। यादियों ने सप्८
पृष्ठा । इस पर क़ूरान से यह आवचन ह--
“नासमक लोग यदद कहेंगे कि शन लोगों ने घररना तिफ्ता ( जिधर मुद्द करके नमाज़ पट्टा जाने ) नयों बदल दिप्ा। उहें जपाद
दोकि पर प्रोर पस्लिम दोनों अलाह 5 ६ैं। दए सिसपो भारना ठीक रास्ते पर लगाता ६ै।”
इसके वाद की यद आायत घोर भी साफ (--
“ओर पूरव शरीर पध्टम दोनों प्रतद्दाट हे ऐै, शनि “नर भी तुम मुद्द करो उधर ही धर्लादह गाहऋरह है। सघगय धाजर सब जगह छोर सब झट्ट जानने बाला ६ |"
इक | के द् के काये की यात्रा छी, जिख फ पाने #, जए एरानी छपुशो नस कक _्ध स्क रस्मो को महम्मद साहब ने संधार दिपा। उसे दाना होगे विल्फकुल नचय गे होदर रु छात्र के चारो तरदा आर आशांश गरगग 7 ! ः कि मुहस्मद साहएव ने इस रिवाज णो बना पर दिया आर गम फ् फपडे क्र इक हि के लिए कपड़े पहन कर चधर सगाने जी दिग्रणा हर पी ।
'अक >०. ऋषारीकर्नी३तवअफी सका आकमआ... ग्यीमात का... पिन जज अर उमा... नमक... नही. मिड न अ्म्क जरा
+ कुरान २-१४२ । १२-१६५
३०यम्यानकीसात-बैह०
श्ड८ हजरत मुहम्मद ओर इसलाम
दोपहर की नमाज़ के वाद मुहम्मद साहब ने एक निराकार ईश्वर, ओर सव आदमियों के भाई भाई होने पर उपदेश दिया। उसके वाद क्रैश के सरदारों ने मुहम्मद साहब को अपना सरदार मानते हुए अपनी पिछली भूलों के लिये दुःख जताया। मुहस्मद साहब की आंखों से आंधू गिरने लगे। उन्होंने जवाब दिया--
८ हां आज मेरी तरफ से आप लोगों के ऊपर कोई इलज़्ाम नहीं रहा | अब्लाइ आप को साफ़ कर देगा। वह सब दयावानों से बढ़कर दयावान ( रहमुरंहमीन) है। ”?
इसके वाद अपने वाक्नी साथियों की तरफ झुड़कर भुहम्मद साहव ने उन्हें कुरान की ये आयतें पढ़कर सुनाई--
“८ बुराई का इलाज भलाई से करो |
“सबसे अच्छी बात वह करता है जो अ्रल्लाह की तरफ़ लोगों को चुलाता हे और खुद नेक काम करता है ओर फिर कद्दता है कि मैंने अपने के अल्लाह पर छोड़ दिया हे ।
८ भलाई ओर बुराई वरावर नहीं दो सकतीं, दूसरा तुम्हारे साथ बुराई करे तो तुम जवाब में उसके साथ भलाई करो; और वद्द जिसे तुमसे दुशमनी थी, ठ॒म्दारा दिली दोस्त हों जायगा।
“जिन लोगों के दिलों में विश्वास है उनसे कद्दो कि वह उन लोगों को माफ़ करदें जिन्हें उस दिन का डर नहीं है जिस दिन वह श्रल्लाइ के सामने जांयगे |
क्र्थ
मक्के की जीत १४९
४ श्र जल्दी दी अपने रब्च से अपनी मूलों फ्रे लिये मारी भागों ओर उस स्वर्ग जे लिये प्रार्थना करो जो घरती ऋझर चारयश +7) फैली हुई है। वद उन लोगों के लिये है जो परटकूगार यानी
सदाचारी हैं, जो गरीबी श्रमीरी दोने में दान देते रदने है, हे चपने गुस्से को दवाते हैँ श्रौर जो आंदमियों यो माल बरने हें इयोंए अल्लाद दूसरों के ताथ नेकी करने वालों वो ही प्यार बरता है | #"! कुछ दिन मकफे मे रहकर मुटम्मद साइन ने बी से चारा तरफ अपना धर्म सममाने वाले भेजे । इन लोगों को फिर साफ तौर पर यह हिदायत दी गई कि किसी के साथ सदयी + करना | खालिद सदा स तवियत झा नेज था। दा अुण्मर कचीले के कुछ लोगों से लड़ पड़ा, जिसमें उस फयीले मे एज लोग सारे गए। मह्स्मद साहब को जब पना नगा पन्यनि दुःखी होकर दा वार चिझ्लाकर कहा--ए पत्ाह ! मे इस पा में बेकसूर हैं” फिर खालिद को बुलारर हाँदा फोर दुर्गा छली को भेजकर जिन सिने का जितना नुश्सान या था से से साझी मांगी और सवबयो पूरा पूरा शरशाना गिलिशया लिखा है कि घली ने “धिपनी नरमी से पार नादि पिच कपीर खुले दार्थों इनकी मदद झर छिए सर रा पर हिण ।
इससे पहले एक मुसलमान लटऊे परदस्शणमान मे; दे पाप न्यौर खुद खालिए ५) घ्््द्ा है] है गज । फो बंपर $ दल “कह | &प्टरश मान
हा ललुनुइल बल बम आयी आरा जांधांब !'३पआशीका-प३० 3 +>पाफय७९ह४०गपेडमपवेक,. वकान,
» पुराने ६२-४६, २३-६६, ४५५३२, २४, 'शंश ५०, २-५००, ६:५६।
१५७० हज़रत मुहम्मद ओर इसलाम
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की खुश करने के लिये खालिद ने उससे आकर कहा “मेंने तुम्हारे वाप के मारने का वदला लिया है” लेकिन मुहम्मद साहव किसी से भी हत्या तक का वदला लेने को मना कर चुके थे। नौजवान अव्दुरहमान ने उलट कर जवाब दिया-- “यं क्यों नहीं कहता कि तूने अपने चचा की हत्या का बदला लिया है ! तू ने इस काम से इसलाम पर धव्वा लगाया है !”
जव यह सवाल आया कि अरव वाक़ी ज़िन्दगी मकक्के में विताईं जावे या मदीने सें तो मुहम्मद साहव ने यह कहकर सदीने के लिये फ़रेसला ढिया कि सदीने वालों ने उन दिनों भेरा साथ दिया था, जब कोई मेरे साथ न था और मेंने वचन दिया था कि में उनके ही वीच में मरूगा।
मकक्के से उतर कर तायफ का नगर जिसमें “लात” देवी का सशहूर मन्दिर था, पुराने अरब रिवाजों का सबसे बड़ा गढ़ था । १० साल पहले इसी नगर से मुहम्मद साहब लहू लुहान कर निकाले गये थे | तायफ के आस पास के कुछ कुबीलों ने अभी तक सदीने की नई क़ोमी सरकार या इसलाम धर्म दोनों में से किसी को नहीं अपनाया था। इस वार मुहम्मद साहव की मकक्के की जीत ने उनकी दुशमनी की आग को भड़का दिया। तायफ् के पास औत्तास की घाटी में कुछ पहाड़ी कवीले मुसल- मानों पर हमला करने के लिये जमा हुएण। मुहम्मद साहव सक्के से रोकने के लिये निकले ओर हुनैन ओर ओतास की लड़ाइयों में कम से कम खून खराबी के वाद नई अरब क़ोमी
मक्ऊे की जीत नए
सरकार के खिलाफ इस आसरी बलते फो ठगदा जिया। इन के कब जब; क कस.
लड़ाश्या म दुशमन का सारते का ऊगाहे मुसलमाना ने झाग्मदर क्र ० कफ. श फ् क्र.
साहव के हुकुम स उन्हें सिरे पक फर ले प्रानि की रिग्मत
की ओतास की लड़ाई में उस हवाजिन झवीत के से #सार
आदमी पकड़ लिये गए, जिस कूवील फी घाया हीमा ने पांच
साल बालक मुहम्मद को दूध पिलाया था। बृद्ििया गरीमा अभी जीती थी। मुहम्मद साहब फी जीन ऊे घाद था एनसे मिलने आई। मुहम्मद साहब ने खडे होजर परी एएएल मे
उसकी आवभगत की । घपनी चाएइर उधार छरे इसे “द्यन के लिये विछा दी और उसके कटने पर उसी एस पी (मार
हवाजिन फेदियों को छोड़ दिया।
मक्के लोटकर महस्मद साटब ने का ये नोगा जा धन 9 सोध हेते रहने के लिये मजआाज़ मामी एज मी #४ की सीस देते रहने के लिये सुआज नामी एज पापसों शो
को के . ध् $ “इसाम” बनाया और शहर के पन्गोयस्ल थे; लिये हे नोणाशन उतबह का दात्र का ह्ाश्मि चना । पर पएने सामगा
का ०, रे. बी कक च्छ क्र जज ] + का को लेकर वह मदीने लोट पाए । सदीने पढ़ेचने णे थी थे दिनो
कद स- ् वाद तायफ के कुद सास सास लोग मास्मा सयाए ” पास ् पक बे
+ ५ कफ. सेकय सि की कक. न 2 लक बाएं, इन्हांन दस खान्चे प्ह्ल छा बल झा (एप भ ४म ४६557
आर क्या है. अत सइयघय अपनी, इजाजत चाही । तायफ सहन शी मी सरणार मे मिल
लिया गया।
तह? क़बोले का सुसलमान होना
न्कैक्त९क
इन दिनों ही 'तइ” कवीले ने इसलाम अपनाया जिसकी कहानी खासी मनभाती है| यह कवीला मदीने से कोई दे सो मील उत्तर में शाम की सरहद पर रहता था। शाम के रोमी हाकिमों ने उसे मदीने की नई सरकार के खिलाफ गुटवन्दियों का अड्डा बना रखा था। वहां मजहव की आजादी न थी। इसलाम फेलाने वाले वहां मार डाले जाते थे। मुहम्मद साहव ने अली को फ्रोज के साथ भेजा। ग्ररज सिफ़र यह थी कि तह! कवीले के सरदारों पर जोर दिया जावे कि अपने इलाके में लोगों को मजहव की आजादी दें और इसलाम फेलाने वालों को समम्ााने की इजाजत हो । यह कवीला ऐसी जगह रहता था कि नई अरव सरकार के लिए उनकी दोस्ती बड़े काम की थी । हुनैन की लड़ाई तक में मुहम्मद साहब की फ़ोज के अन्दर इस तरह के चहुत से आदमी मौजूद थे जिन्होंने इसलाम धर्म नहीं अपनाया था, जो अभी तक अपने पुराने धर्मों पर ही कायम थे, लेकिन जिन्होंने सबके लिए की धरम आजादी के
-फा-करकुरमाप- 7 मेज पान -आपारगाक- कमी मपान पाइल्ग राह फ " ३३१ फम्मित-.. आध्य: +क-माण अमर,
० स०-उ०५जआन-उरवाज-मेक, +भामन्क-मन०+फे अपनाना. नमन ५.७ जन. "ही न-ान-छ/न भर दनन कि -७धथ ५ 33 ९७+4ज-न न सात, डर नि
तई? इबीले का मुसलमान दोना प्
असूल को सान लिया था। और जो या तो मदीने ४ी सरभार की प्रजा थे आर या इनके क्या लेंस मसंद्ान पर 7 ७६ #7 हू & न साथ दोस्ती कर ली थी।
'इ? कदीले के इलाऊे में ऊब पतली हप परी सार
४ पान +
ताइ
दुनिया भे सगार
बज
उस कवीले का सरदार था। यद्द अदी हू हातिम ताई का चेटा था। अदी अपने बाल बर्षों कोट भाग कर शाम चला गया। उसकी बदिन समनाह पार ओर लोग पकड़ लिए गए और मदीने में मुहम्मद सलाद सामने लाए गए। मुहम्मद साहब को जब पता रूया कि सफनाह उस हातिम ताद की लड़की है. जो पपन थो दिल, याण कौर दान के लिए सारी दुनिया मे मशहर था तो शाम्मर राग: ने यह कह कर कि--हातिम के घनन्दर सचमुच ये सद माया सौजूद थी, जो एक मुसलमान में होनी चादियें, सपरय पलनगा ऐसे लोगो से प्रभ रखता है” सफनाए दोर इसहः साथ के शगए लोगों को उसी दम विना किसी शान के छो5 दिया। घी के जब यह मालूम हृआ दहू महस्मटए साहय से मिलते मरने आया । सुहस्मर साहब उन दिनों परव छे बाग थी ढिसले के भालिक थे। इस पर भी उनके सादे राशन खान थो देशपार ञअदी पर गहरा श्यसर पा । पदी लिखता (---
ँ | स्क्पाड़ पता ह# च्ती ५उन्होंने ( मुण्म्मद सारदव ने) ुलमे मेरे माश श्ाप।एर शर
हे है
नाम दता दिया उन्होंने दद्ा मेरे राघ भरें घर नया कमज़ोर दुदली प्रौर्त ने उनसे छुछह णण्ना चारा। मे गा दफा
२५४ हज़रत मुहम्मद और इसलाम
उसके मामलों पर वात चीत करने लगे। मेंने अपने दिल में सोचा कि यह ढल्गध तो कुछ बादशाहों का सा ढंग नहीं है। जब हम उनके घर पहुंचे उन्होंने मुझे बैठने के लिये चमड़े का एक गद्दा दिया, जिसके अन्द्र खजूर की पत्तियां भरी थीं ओर वे खुद नंगी ज़मीन पर बैठ गये, मैंने फिर सोचा यद्द तो कोई शाहों का सा ढंग नहीं है |?”
थोड़े ही दिनों में धीरे धीरे 'तइ” क़वीले के सच लोगों ने इसलाम धर अपना लिया। अपना इलाक़ा उन्हों ने मदीने के राज में जोड़ लिया ओर उस राज की ह॒द उत्तर में दूर तक बढ़ गई ।
हमे याद रखना चाहिये कि इंस त्तमाम जमाने में मुहम्मद साहब की ज़िन्दगी के वरावर दो पहलू थे। वह एक नए धम के चलाने वाले भी थे ओर मदीने की नई आजाद हुकूमत